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आज मन भारी है!

स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के अनेक गीत मैंने पहले शेयर किए हैं, आज एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी भावुकता के अर्थात मन के कवि थे| कोई कवि अपनी कविताओं में वीरता बघार सकता है, परंतु मन की बात तो उसको भावुक होकर ही कहानी होगी|

लीजिए प्रस्तुत है मन के व्यथित अथवा किसी भी कारण से, भारी होने की स्थिति का यह गीत-

न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है

हृदय से कहता हूँ कुछ गा
प्राण की पीड़ित बीन बजा
प्यास की बात न मुँह पर ला


यहाँ तो सागर खारी है
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है

सुरभि के स्वामी फूलों पर
चढ़ाए मैंने जब कुछ स्वर
लगे वे कहने मुरझाकर


ज़िन्दगी एक खुमारी है
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है

नहीं है सुधि मुझको तन की
व्यर्थ है मुझको चुम्बन भी
अजब हालत है जीवन की


मुझे बेहोशी प्यारी है
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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