आग अब भी कहीं दबी-सी है!

आज बिना किसी भूमिका के जावेद अख्तर साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| जावेद अख्तर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और फिर कविता अपनी बात स्वयं कहती है|

लीजिए प्रस्तुत है जावेद अख्तर साहब की यह ग़ज़ल-

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है,
हँसती आँखों में भी नमी-सी है|

दिन भी चुपचाप सर झुकाये था,
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है|

किसको समझायें किसकी बात नहीं,
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है|


ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई,
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है|

कह गए हम ये किससे दिल की बात,
शहर में एक सनसनी-सी है|

हसरतें राख हो गईं लेकिन,
आग अब भी कहीं दबी-सी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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