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मिला विहान को नया सृजन!

आज शुद्ध और बेलौस प्रेम के कवि स्वर्गीय रामानन्द दोषी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| दोषी जी की प्रेम के अभिव्यक्ति अलग ही किस्म की होती थी, उनका प्रसिद्ध गीत है- ‘मन होता है पारा, ऐसे देखा नहीं करो’! काव्य लेखन के अलावा दोषी जी ने कई पत्रिकाओं का संपादन किया, जिनमें ‘कादंबिनी’ भी शामिल थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामानन्द दोषी जी का यह गीत-

कि तुम मुझे मिलीं
मिला विहान को नया सृजन,
कि दीप को प्रकाश-रेख
चाँद को नई किरन ।

कि स्वप्न-सेज साँवरी
सरस सलज सजा रही,
कि साँस में सुहासिनी
सिहर-सिमट समा रही|
कि साँस का सुहाग
माँग में निखर उभर उठा,
कि गंध-युक्त केश में
बंधा पवन सिहर उठा|

कि प्यार-पीर में विभोर
बन चली कली सुमन,
कि तुम मुझे मिलीं
मिला विहान को नया सृजन ।


कि प्राण पाँव में भरो
भरो प्रवाह राह में,
कि आस में उछाह सम
बसो सजीव चाह में|
कि रोम-रोम रम रहो
सरोज में सुबास-सी,
कि नैन कोर छुप रहो
असीम रूप प्यास-सी|
अबाध अंग-अंग में
उफान बन उठो सजनि,
कि तुम मुझे मिलीं

मिला विहान को नया सृजन ।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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