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मैं एक तड़पता क़तरा हूँ!

अली सरदार जाफ़री साहब की एक लंबी कविता या कहें की नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| अली सरदार जाफ़री साहब बहुत विख्यात शायर थे और हिन्दी फिल्मों में भी उनकी अनेक रचनाओं का सदुपयोग किया गया है|

आज की इस रचना में अली सरदार जाफ़री साहब ने ज़िंदगी के बारे में, खुलकर अपने विचार रखे हैं, किस तरह से देखा जाए तो हर इंसान अमर कहला सकता है| लीजिए इस रचना का आनंद लीजिए-

फिर एक दिन ऐसा आयेगा
आँखों के दिये बुझ जायेंगे,
हाथों के कँवल कुम्हलायेंगे
और बर्ग-ए-ज़बाँ से नुक्तो-सदा
की हर तितली उड़ जायेगी|


इक काले समन्दर की तह में
कलियों की तरह से खिलती हुई,
फूलों की तरह से हँसती हुई
सारी शक्लें खो जायेंगी|
खूँ की गर्दिश, दिल की धड़कन
सब रागनियाँ सो जायेंगी|

और नीली फ़ज़ा की मख़मल पर
हँसती हुई हीरे की ये कनी,
ये मेरी जन्नत मेरी ज़मीं
इसकी सुबहें इसकी शामें,
बेजाने हुए बेसमझे हुए
इक मुश्त ग़ुबार-ए-इन्साँ पर

शबनम की तरह रो जायेंगी|

हर चीज़ भुला दी जायेगी
यादों के हसीं बुतख़ाने से,
हर चीज़ उठा दी जायेगी
फिर कोई नहीं ये पूछेगा
‘सरदार’ कहाँ है महफ़िल में!


लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा
बच्चों के जेहन से बोलूँगा
चिड़ियों की ज़बाँ से गाऊँगा|

जब बीज हँसेंगे धरती में
और कोंपलें अपनी उँगली से
मिट्टी की तहों को छेड़ेंगी
मैं पत्ती-पत्ती कली-कली
अपनी आँखें फिर खोलूँगा
सरसब्ज़ हथेली पर लेकर
शबनम के क़तरे तोलूँगा|


मैं रंग-ए-हिना, आहंग-ए-ग़ज़ल,
अन्दाज़-ए-सुख़न बन जाऊँगा,
रुख़सार-ए-उरूस-ए-नौ की तरह
हर आँचल से छन जाऊँगा|

जाड़ों की हवायें दामन में
जब फ़स्ल-ए-ख़ज़ाँ को लायेंगी,
रहरू के जवाँ क़दमों के तले
सूखे हुए पत्तों से मेरे
हँसने की सदायें आयेंगी|


धरती की सुनहरी सब नदियाँ
आकाश की नीली सब झीलें
हस्ती से मेरी भर जायेंगी|

और सारा ज़माना देखेगा
हर क़िस्सा मेरा अफ़साना है
हर आशिक़ है सरदार यहाँ
हर माशूक़ा सुल्ताना है|


मैं एक गुरेज़ाँ लम्हा हूँ
अय्याम के अफ़्सूँखाने में
मैं एक तड़पता क़तरा हूँ
मसरूफ़-ए-सफ़र जो रहता है
माज़ी की सुराही के दिल से
मुस्तक़्बिल के पैमाने में|

मैं सोता हूँ और जागता हूँ
और जाग के फिर सो जाता हूँ
सदियों का पुराना खेल हूँ मैं
मैं मर के अमर हो जाता हूँ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आँख बच्ची की पनीली है!

आज अदम गोंडवी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| ठेठ देहाती अंदाज़ में आम जनता के जीवन की सच्चाइयों को अदम गोंडवी जी ने बड़े सलीके के साथ बेबाक़ी के साथ अभिव्यक्त किया है|


लीजिए आज अदम गोंडवी जी की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।

भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।

सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें!

ज़नाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| ‘नूर’ साहब उस समय शायरी के क्षेत्र में सक्रिय गिने-चुने हिन्दू शायरों में से एक थे| कई बार ऐसी प्रतियोगिता भी होती थीं, जिनमें एक मिसरे को लेकर ग़ज़ल के शेर लिखने को कहा जाता था|


एक बार ग़ज़ल लिखने के लिए मिसरा दिया गया था- ‘क़ाफिर हैं वो लोग जो कायल नहीं इस्लाम के’| इस पर नूर साहब ने शेर इस प्रकार लिखा था- ‘लाम के मानिंद हैं, गेसू मेरे घनश्याम के, क़ाफ़िर हैं वो लोग जो कायल नहीं ‘इस लाम’ के| खैर ये कहीं पढ़ा था अचानक याद आ गया|


लीजिए नूर साहब की ग़ज़ल का आनंद लीजिए-


यारो घिर आई शाम, चलो मयकदे चलें,
याद आ रहे हैं जाम, चलो मयकदे चलें|

दैरो-हरम पे खुल के जहाँ बात हो सके,
है एक ही मुक़ाम, चलो मयकदे चलें|

अच्छा, नहीं पियेंगे जो पीना हराम है,
जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें|


यारो जो होगा देखेंगे, ग़म से तो हो निजात,
लेकर ख़ुदा का नाम, चलो मयकदे चलें|

साक़ी भी है, शराब भी, आज़ादियाँ भी हैं,
सब कुछ है इंतज़ाम, चलो मयकदे चलें|

ऐसी फ़ज़ा में लुत्फ़े-इबादत न आएगा,
लेना है उसका नाम, चलो मयकदे चलें|


फ़ुरसत ग़मों से पाना अगर है तो आओ ‘नूर’,
सबको करें सलाम, चलो मयकदे चलें||


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बस एक निगाह प्यार की!

आज मोहम्मद रफी साहब का एक गाना शेयर कर रहा हूँ| रफी साहब ने हर तरह के गाने गाए हैं, और आज का गाना मस्ती से भरा हुआ है| वर्ष 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- मेरे सनम के लिए मजरूह सुल्तानपुरी साहब के लिखे इस गीत का संगीत दिया है ओ पी नैयर साहब ने|


लीजिए इस मस्ती भरे गीत का आनंद लीजिए-

पुकारता चला हूँ मैं
गली गली बहार की,
बस एक छाँव जुल्फ की
बस एक निगाह प्यार की|

ये दिल्लगी ये शोखियाँ सलाम की
यही तो बात हो रही है काम की,
कोई तो मुड़ के देख लेगा इस तरफ
कोई नज़र तो होगी मेरे नाम की|
पुकारता चला हूँ मैं…


सुनी मेरी सदा तो किस यकीन से
घटा उतर के आ गई ज़मीन पे,
रही यही लगन तो ऐ दिल-ए-जवां
असर भी हो रहेगा एक हसीन पे|
पुकारता चला हूँ मैं …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है !

आज दुष्यंत कुमार जी की लिखी एक और ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो आपातकाल में लिखी गई उनकी ग़ज़लों में शामिल थी और जिसको उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल किया गया था| इसमें सभी रचनाएँ आपातकाल के विरोध में आन्दोलनधर्मी ग़ज़लें थीं|

उस समय आपातकाल के विरोध में जयप्रकाश नारायण जी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था और इस ग़ज़ल के एक शेर में भी कहा गया है- ‘एक बूढ़ा आदमी है देश में, या यूं कहें, इस अंधेरी रोशनी में एक रोशनदान है’|

लीजिए प्रस्तुत है उस ज़माने में अत्यंत लोकप्रिय हुई यह ग़ज़ल-

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है|

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है|

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है|

मस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है|

इस क़दर पाबन्दी—ए—मज़हब कि सदक़े आपके,
जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है|

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है|

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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आना-जाना रहे, रहे ना रहे!

आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग,जो मेरे लिए अविस्मरणीय है।


दिल्ली में सरकारी सेवा के दौरान ही मैंने स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की एक और परीक्षा दी, जो हिंदी अनुवादक के पद पर चयन के लिए थी। इस परीक्षा में मैं सफल हुआ और उसके आधार पर ही आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक पद के लिए मेरा चयन हुआ।
इस परीक्षा के प्रश्न-पत्र का एक प्रश्न मुझे आज तक याद है। प्रश्न शायद‌ था ‘लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र’। इस प्रश्न के उत्तर में मैंने एच.जी.वेल्स के विज्ञान आधारित उपन्यास ‘द आइलैंड ऑफ डॉ. मोया’ का उदाहरण देते हुए इसकी व्याख्या की थी। मैंने लिखा था कि जैसे कि यह माना जाता है कि हमारे पूर्वज बंदर थे और विकसित होते-होते आज के मानव का परिष्कृत रूप सामने आया है।

उपर्युक्त उपन्यास के आधार पर मैंने लिखा था कि डॉ. मोया इसमें विभिन्न प्रजातियों के जानवरों को लाकर एक द्वीप पर रखते हैं और उनको इंसान की तरह व्यवहार करना सिखाते हैं। किस तरह उठना-बैठना है, किस तरह खाना-पीना है। इस प्रकार सभी जानवर इंसान जैसा व्यवहार करने लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती है, उनको अनुशासित रखना मुश्किल होता जाता है, जहाँ मौका मिलता है, कुत्ता जीभ निकालकर उसी तरह पानी पीने लगता है, जैसे पहले पीता था, हिंसक जानवरों की मूल प्रवृत्ति वापस लौटने लगती है और डॉ. मोया वहाँ से अपनी जान बचाकर भागते हैं।


उपर्युक्त उदाहरण देकर मैंने यह लिखा था कि यह माना जाता है कि हम पशु से विकसित होकर मनुष्य बने थे लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती जा रही है, हमारे अंदर की पाशविक प्रवृत्ति पुनः पनपने लगी है।

खैर, जो भी हो मैं परीक्षा में सफल हुआ और आकाशवाणी, जयपुर में मेरी हिंदी अनुवादक के पद पर नियुक्ति हुई। उद्योग मंत्रालय तथा संसदीय राजभाषा समिति में 6 वर्ष सेवा करने के बाद 30 सितंबर,1980 की रात में मैंने दिल्ली छोड़ी और 1 अक्तूबर को आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण किया।

जयपुर के साहित्यिक मित्रों और वहाँ के परिदृश्य के संबंध में, मैं शुरू के ही एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ, कुछ और बातें, जो पहले नहीं कह पाया था अब कहूंगा।

आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था और मेरी मित्रता वहाँ कार्यक्रम विभाग के लोगों से अधिक थी।


प्रशासन शाखा में, मेरे सामने बैठते थे- श्री राम चंद्र बैरवा, जो हेड क्लर्क थे, कार्यक्रम विभाग के सभी लोगों की फाइलें, सर्विस-बुक आदि उनके पास ही आती थीं और वो पूरा समय इस बात को लेकर कुढ़ते रहते थे कि कार्यक्रम विभाग के लोगों को कितनी अधिक तनख्वाह मिलती है।


मेरे बगल में श्री राम प्रताप बैरवा थे, जो क्लर्क थे और बाहरी कलाकारों को अन्य केंद्रों पर प्रोग्राम आदि के अनुबंध वही जारी करते थे अतः कलाकार उनके पास आते रहते थे। मुझे याद है कि उनके पास आने पर मैंने ज़नाब अहमद हुसैन, मुहम्मद हुसैन के साथ अनेक बार चाय पी है।

आकाशवाणी के बाहर ही एम. आई. रोड पर एक चाय की दुकान थी और अक्सर ऐसा होता था कि हेड क्लर्क महोदय किसी एक के साथ चाय पीकर वापस लौटते थे और किसी दूसरे के साथ वापस चले जाते थे।

आकाशवाणी में एक उद्घोषक थे, नाम याद नहीं आ रहा है, उन्होंने अपने कमरे में यह शेर लिखकर लगाया हुआ था-

हर दौर में हम हाफिज़-ए-किरदार रहेंगे
खुद्दार थे, खुद्दार हैं, खुद्दार रहेंगे।


वैसे पता नहीं वो खुद्दारी का मतलब क्या समझते थे, क्योंकि उनका सबसे झगड़ा रहता था।
एक और मित्र थे, कार्यक्रम विभाग में- श्री बैजनाथ गौतम, जो ईसुरी के प्रसिद्ध लोकगीत बड़े मन से गाते थे. जैसे-

हम खें जुगनिया बना गए, अपुन जोगी हो गए राजा।
दस दरवाज़ों का महल बना गए,
ताही में पिंजरा टंगा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।

पिंजरे में तोता और मैना बिठा गए,
बोली अनेकों रटा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।


शायद ईसुरी के लोकगीत के आधार पर ही राज कपूर जी ने अपनी फिल्म में यह गीत रखा था-

रंगमहल के दस दरवाजे,
ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी,
सैंया निकस गए, मैं ना लड़ी थी।


तीन साल के जयपुर प्रवास में जहाँ मैंने हिंदी में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की, वहीं केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के तीन माह के प्रशिक्षण में प्रथम स्थान प्राप्त करके, डा. कर्ण सिंह जी के कर कमलों से सिल्वर मैडल भी प्राप्त किया। इस प्रशिक्षण के प्रतिभागियों में मैं बहुत जूनियर था तथा यह मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी और यह मैडल बाद में मेरे काफी काम आया।

जयपुर प्रवास के दौरान हम तीन मकानों में बहुत थोड़ी अवधि के लिए और एक मकान में लंबे समय रहे, जिसमें टीन की छत थी, लेकिन हमारे मकान मालिक का प्रेम ऐसा था कि हम उसे छोड़ ही नहीं पाते थे। इस मकान में जाने की कहानी भी विशेष थी, हम यह मकान देख चुके थे लेकिन टीन की छत होने के कारण जाना नहीं चाहते थे। हमने एक मकान पसंद करके, पहला मकान छोड़ दिया और हम अपना घर का सामान, जो कि उस समय एक ठेले पर ही आ गया था, साथ लेकर नए मकान की ओर चल दिए, जिसके बारे में एक दिन पहले ही बात हो चुकी थी। लेकिन उस लालची आदमी को हमारे बाद शायद किसी ने ज्यादा पैसे ऑफर कर दिए और उसने वह मकान उसको दे दिया।


अब हम, ठेले पर अपने सामान के साथ सड़क पर थे, तब हम अचानक टीन की छत वाले इस मकान पर गए और उन्होंने हमारा भरपूर स्वागत किया। मेरे मकान मालिक मुझे भाई साहब कहते थे और मेरी पत्नी को बेटी कहते थे। जयपुर प्रवास का अधिकतम समय हमने इसी घर में बिताया।

अब अंत में श्री बलबीर सिंह रंग जी के एक दो शेर याद आ रहे हैं –

आब-ओ-दाना रहे, रहे ना रहे
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे।

हमने गुलशन की खैर मांगी है,
आशियाना रहे, रहे ना रहे।


फिलहाल इतना ही, नमस्कार।
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चांद आहें भरेगा!

आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक- मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर करूंगा| नायिका के सौंदर्य का वर्णन करने वाले अनेक गीत आपने सुने होंगे, लेकिन इस ऊंचाई वाला गीत बहुत मुश्किल से सुनने को मिलता है, और फिर मुकेश जी की आवाज़ तो इसमें अलग से जान डाल ही रही है|

लीजिए  फिल्म- ‘फूल बने अंगारे’ के लिए आनंद बख्शी जी के लिखे इस गीत का आनंद लीजिए, जिसे कल्याण जी आनंद जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने गाया है-

चांद आहें भरेगा,
फूल दिल थाम लेंगे,
हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


आँखें नाज़ुक सी कलियां,
बात मिश्री की डलियां,
होंठ गंगा के साहिल,
ज़ुल्फ़ें जन्नत की गलियां|
तेरी खातिर फ़रिश्ते,
सर पे इल्ज़ाम लेंगे|

हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


चुप न होगी हवा भी,
कुछ कहेगी घटा भी,
और मुमकिन है तेरा,
ज़िक्र कर दे खुदा भी|
फिर तो पत्थर ही शायद,
ज़ब्त से काम लेंगे|

हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


चाँद आहें भरेगा,
फूल दिल थाम लेंगे,
हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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फिर भी हम अकेले हैं!

आज एक गीत शेयर कर रहा हूँ जो सबा अफ़गानी जी का लिखा हुआ है और जहां तक मुझे याद था, मैंने इसे बहुत पहले अनूप जलोटा जी की आवाज में सुना था, लेकिन अब मालूम हुआ की ये टी सीरीज़ की ओर से ‘कसम तेरी कसम’ की एल्बम के लिए सोनू निगम जी की आवाज में रिकॉर्ड किया गया है और इसका संगीत दिया है- नरेश शर्मा जी ने|

खैर मुझे इस गीत के बोल बहुत अच्छे लगते हैं और ये भी आज की ज़िंदगी की एक सच्चाई है| लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-

ज़िन्दगी की राहों में
रंजो ग़म के मेले हैं|
भीड़ हैं क़यामत की
फिर भी हम अकेले हैं|

ज़िन्दगी की राहों में
रंजो ग़म के मेले हैं|


आईने के सौ टुकड़े
हमने करके देखा है|
एक में भी तनहा थे
सौ में भी अकेले हैं|


ज़िन्दगी की राहों में
रंजो ग़म के मेले हैं|


जब शबाब आया है
आँख क्यों चुराते हो,
बचपन में हम और तुम
साथ साथ खेले हैं|

भीड़ हैं क़यामत की
और हम अकेले हैं|


गेसुओं के साये में
एक शब गुज़ारी थी,
आपसे जुदा हो के
आज तक अकेले हैं|

ज़िन्दगी की राहों में,
रंजो ग़म के मेले हैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सुख से डर!

हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा का कविता लेखन का अपना अलग ही अंदाज़ था, अक्सर वे बातचीत के लहज़े में कविता लिखते थे| भारतीय ज्ञानपीठ सहित अनेक साहित्यिक और राष्ट्रीय पुरस्कारों से विभूषित भवानी दादा हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं|

आज की इस रचना में भी आप उनकी रचनाधर्मिता की बानगी पाएंगे, जहां कवि ‘सुख’ से डरता है| लीजिए इस रचना का आनंद लीजिए-


जिन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,
इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,
क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,
बड़े सुख आ जाएं घर में
तो कोई ऐसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूं।


यहां एक बात
इससे भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,
बड़े सुखों को देखकर
मेरे बच्चे सहम जाते हैं,
मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हें
सिखा दूं कि सुख कोई डरने की चीज नहीं है।


मगर नहीं
मैंने देखा है कि जब कभी
कोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते में
बाजार में या किसी के घर,
तो उनकी आँखों में खुशी की झलक तो आई है,
किंतु साथ साथ डर भी आ गया है।


बल्कि कहना चाहिये
खुशी झलकी है, डर छा गया है,
उनका उठना, उनका बैठना
कुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता,
और मुझे इतना दु:ख होता है देख कर
कि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता।


मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है,
इससे डरो मत बल्कि बेफिक्री से बढ़ कर इसे छू लो।
इस झूले के पेंग निराले हैं
बेशक इस पर झूलो,
मगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़ते
खड़े खड़े ताकते हैं,
अगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ।


तो चीख मार कर भागते हैं,
बड़े बड़े सुखों की इच्छा
इसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है,
कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया था
अब मैंने वह फोड़ दी है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरी आत्मा की ये आवाज़ है!

हिन्दी फिल्मों के प्रमुख गीतकार और श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय- पंडित भरत व्यास जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| भरत व्यास जी का गीत लेखन का अपना अलग अंदाज़ था और एक बात यह कि उनकी रचनाओं में उनकी अटूट आस्था दिखाई देती है| इत्तफाक से एक बात याद आ रही है कि कांग्रेस नेता श्रीमती गिरिजा व्यास उनकी ही बेटी हैं|

आज के गीत में भी पंडित भारत व्यास जी की अडिग आस्था के दर्शन होते हैं, ईश्वर से वे किस अंदाज़ में बात करते हैं, वह देखने लायक है| लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-


ज़रा सामने तो आओ छलिये
छुप छुप छलने में क्या राज़ है,
यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा
मेरी आत्मा की ये आवाज़ है|
ज़रा सामने …

हम तुम्हें चाहें तुम नहीं चाहो
ऐसा कभी नहीं हो सकता,
पिता अपने बालक से बिछुड़ से
सुख से कभी नहीं सो सकता|

हमें डरने की जग में क्या बात है
जब हाथ में तिहारे मेरी लाज है,
यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा
मेरी आत्मा की ये आवाज़ है|
ज़रा सामने …

प्रेम की है ये आग सजन जो
इधर उठे और उधर लगे,
प्यार का है ये क़रार जिया अब

इधर सजे और उधर सजे|
तेरी प्रीत पे बड़ा हमें नाज़ है,
मेरे सर का तू ही सरताज है|
यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा,
मेरी आत्मा की ये आवाज़ है|
ज़रा सामने …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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