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Poetry

अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ !

एक बार फिर से आज जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| क़तील साहब भारतीय के एक अत्यंत लोकप्रिय शायर रहे हैं| उनकी इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने भी गाया है|

कवि/शायरों की कैसी-कैसी ख्वाहिशें होती हैं, जैसे इस ग़ज़ल में ही क़तील साहब ने कुछ बेहतरीन ख़्वाहिशों का ज़िक्र किया है, जो किसी कवि/शायर की ही हो सकती हैं| लीजिए इस लोकप्रिय ग़ज़ल का आनंद लीजिए –   

अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ,
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ|

कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ


थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रोशनी हो, घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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