तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या!

आज फिर से एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे लिखा है ‘ओबेदुल्लाह अलीम’ साहब ने और ग़ुलाम अली साहब ने गाया है|

ग़ुलाम अली साहब का एक प्रसंग याद आ रहा है, मेरे बच्चों को मालूम है कि मुझे ग़ुलाम अली जी बहुत पसंद हैं, तो बेटे ने सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में उनके प्रोग्राम के लिए 5000 रु का एक टिकट मेरे लिए खरीदा और मैं वो प्रोग्राम सुनने गया| इस कार्यक्रम में एक श्रोता ने फरमाइश की- ‘इतनी मुद्दत बाद मिले हो’, ग़ुलाम अली जी फरमाइश को समझ गए, लेकिन बोले मैं तो आता ही रहता हूँ, आप ही नहीं आए होंगे|

मैं कहना यह चाहता था कि वो समय अलग था, जब ग़ुलाम अली साहब जैसे पाकिस्तानी कलाकार यहाँ आते रहते थे, अब तो यह लगभग असंभव हो गया है|


अपने ये कवि-शायर कभी कितने सीधे लगते हैं, जो जितना मिल जाए उसमें संतुष्ट होने की कोशिश करते हैं| अब जैसे इस ग़ज़ल में ही शायर महोदय कहते हैं कि कुछ दिन मेरी आँखों में बस जाओ, फिर भले ही ख्वाब बनकर क्यों न रह जाओ|


बहुत सुंदर ग़ज़ल है, इसका आनंद लीजिए-

कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में,
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या|


कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को,
फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या|


एक आईना था सो टूट गया,
अब खुद से अगर शरमाओ तो क्या|


मैं तन्हा था, मैं तन्हा हूँ,
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या|


जब हम ही न महके फिर साहिब,
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ क्या|


जब देखने वाला कोई नहीं,
बुझ जाओ तो क्या, जल जाओ तो क्या|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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