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सूराख पत्थरों में होते न उँगलियों से!

आज स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, स्वर्गीय त्यागी जी अपने अलग तेवरों के लिए जाने जाते थे|

आज की इस ग़ज़ल में भी उन्होंने कविता लेखन के बारे में कुछ अच्छी बात की है, लीजिए इसका आनंद लीजिए-


जा पास मौलवी के या पूछ जोगियों से।
सूराख पत्थरों में होते न उँगलियों से ।

तिनके उछालते तो बरसों गुज़र गए हैं
अब खेल कुछ नया-सा तू खेल आँधियों से ।

मौसम के साथ भी क्या कुछ बदल गया हूँ
हर रोज पूछता हूँ मैं ये पड़ोसियों से ।

जिस काम के लिए कुछ अल्फाज़ ही बहुत थे
वह काम ले रहा हूँ इस वक्त गालियों से ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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