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अभिनंदन के शाल-दुशाले!

स्वर्गीय भाई किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए और उनके एक गीत का सहारा लेते हुए कुछ बातें कहना चाहूँगा| यह गीत मैंने पहले भी एक से अधिक बार शेयर किया है, आज इसका सहारा लेकर कुछ बातें कहने का मन है|

किशन जी से कवि सम्मेलनों के सिलसिले में कुछ बार भेंट हुई और उस सहृदय इंसान को थोड़ा बहुत निकट से जानने का अवसर मिला| वैसे मैं आयोजनों के सिलसिले में जिन कवियों से मिला, केवल आयोजक के रूप में मिला’ कवि के रूप में नहीं|

हां तो आज जिस गीत के बहाने मैं बात करना चाहूंगा उसका मुखड़ा इस प्रकार है-

नागफनी आंचल में बांध सको तब आना,
धागों बिंधे गुलाब हमारे पास नहीं|


कवि सम्मेलन के मंच पर कविगण, इस उम्मीद के साथ आते हैं कि सामने बैठे श्रोताओं के मन में स्थान बना सकें और प्रशंसा प्राप्त कर लें| लेकिन मैंने मंचों पर अक्सर देखा है कि किशन जी, सोम ठाकुर आदि को श्रोतागण शांत रहकर सुन लें, यही बड़ी बात है| जो लोग ‘वाह’ करते हैं, विशाल भीड़ में उनकी नगण्य संख्या के कारण वह इतनी धीमी होती है कि मंच तक नहीं पहुँचती|

चलिए इस गीत का पहला अंतरा प्रस्तुत कर रहा हूँ-

हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोये, आधे जागे,
थोड़े सुख के लिये उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे,
कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित,
इसका सही हिसाब, हमारे पास नहीं।


मैं यह भी बताना चाहूँगा कि सोम ठाकुर जी और किशन सरोज जी में एक दूसरे के प्रति बहुत गहरा सम्मान का भाव रहा है| मुझे याद है एक बार सोम जी कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे थे और उन्होंने किशन सरोज जी को एक गीत के लिए आमंत्रित किया- ‘वो देखो कुहरे में चंदन वन डूब गया’, यह गीत श्रोता समुदाय सामान्यतः पचा नहीं पाता, लेकिन इससे पहले सोम जी ने जो भूमिका बांधी, और अंत में कहा इसको आप एक डाक्यूमेंट्री की तरह महसूस कीजिए, और इसके बाद श्रोताओं ने उस गीत का भरपूर आनंद लिया|

वास्तव में कवि, विशेष रूप से भावुकता से भरे गीतकार, इतने संवेदनशील होते हैं कि उनको उपेक्षित होने पर बहुत चोट लगती है| लोगों के दिल तक पहुँचने के लिए वे क्या-क्या प्रयास नहीं करते, परंतु अक्सर सही वातावरण नहीं मिलता| आज के गीत का दूसरा छंद प्रस्तुत है-

हमने व्यथा अनमनी बेची,
तन की ज्योति कंचनी बेची,
कुछ न मिला तो अंधियारों को,
मिट्टी मोल चांदनी बेची।
गीत रचे जो हमने उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं।


कवि के पास इसके अलावा और क्या है, सब कुछ वह अपने पाठक / श्रोता के लिए समर्पित कर देता है, लेकिन उसके बाद भी जब अपमान और उपेक्षा मिलती है, तब उसका दिल टूट जाता है| रमानाथ अवस्थी जी अक्सर कहते थे कि मैं तो यही चाहूँगा कि मैं आपके पास न आऊँ, मेरे गीत ही आपके पास आएं|

मैं भी अक्सर ब्लॉगिंग के माध्यम से प्रयास करता हूँ, कि श्रेष्ठ रचनाएं आपके पास पहुँचें |
एक बात और बहुत से अन्य कवियों की तरह किशन सरोज जी भी पीते काफी थे, बहुत संवेदनशील और नाजुक हृदय वाले व्यक्ति थे, जिनको श्रोताओं की प्रतिक्रिया से बहुत फर्क पड़ता था| वो बोलते थे कि पीने के बाद श्रोताओं को ‘फेस’ करने की हिम्मत आ जाती है| लेकिन कविता में बेइमानी उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं थी| लीजिए यह छंद प्रस्तुत है-

झिलमिल करतीं मधुशालाएँ,
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ,
घड़ी-घड़ी हर घूँट-घूँट हम,
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ,
पीकर जिसको चित्र तुम्हारा धुंधला जाए,
इतनी कड़ी शराब, हमारे पास नहीं।


और अंत में यही कि ईमानदार कवि अपनी रचना में अपना सब कुछ समर्पित कर देता है और यह अपेक्षा करता है कि श्रोता / पाठक दिल से उसकी रचनाओं के साथ हों| इसकी उम्मीद सामान्य श्रोताओं/पाठकों से ज्यादा होती है, क्योंकि कविगण तो अक्सर इतने आत्म-मुग्ध होते हैं, कि वे दूसरों को आशीर्वाद ही देने की मुद्रा में रहते हैं, प्रशंसा नहीं| ऐसा कवि सम्मेलन में उनके नेपथ्य संवाद से भी समझा जा सकता है|

आखर-आखर दीपक बाले,
खोले हमने मन के ताले,
तुम बिन हमें न भाए पल भर,
अभिनन्दन के शाल-दुशाले,
अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, ये मत पूछो,
कोई अभी जवाब, हमारे पास नहीं।


इस बहाने मैंने आज एक बार फिर स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह लाजवाब गीत शेयर कर लिया आशा है यह सामान्य पाठकों को तो पसंद आएगा|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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एक मुट्ठी धान में!

आज मैं प्रसिद्ध कवि और पूर्व सांसद- श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| माननीय उदय प्रताप जन प्रतिनिधि हैं और सामान्य जन की चिंताओं से उनका सीधा सरोकार भी है| श्री उदय प्रताप सिंह जी संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य के रूप में मेरे पूर्व संस्थान – एनटीपीसी में भी आए थे और वहां आयोजित कवि-सम्मेलन में उनका काव्य पाठ सुनने का सुअवसर भी मुझे मिला था|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदय प्रताप सिंह जी की यह ग़ज़ल –

ये रोज कोई पूछता है मेरे कान में
हिंदोस्ताँ कहाँ है अब हिंदोस्तान में।

इन बादलों की आँख में पानी नहीं रहा
तन बेचती है भूख एक मुट्ठी धान में।

तस्वीर के लिये भी कोई रूप चाहिये
ये आईना अभिशाप है सूने मकान में।

जनतंत्र में जोंकों की कोई आस्था नहीं
क्या फ़ायदा संशोधनों से संविधान में।


मानो न मानो तुम ’उदय’ लक्षण सुबह के हैं
चमकीला तारा कोई नहीं आसमान में।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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जाने कौन आस-पास होता है!

गुलज़ार साहब अपनी शायरी में और फिल्मी गीतों में भी एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं| एक अलग तरह का चमत्कार अक्सर उनकी शायरी और गीतों में देखा जाता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है गुलज़ार साहब का यह गीत –

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है|

होंठ चुपचाप बोलते हों जब,
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो|
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें,
ठंडी आहों में सांस जलती हो|

आँख में तैरती हैं तसवीरें,
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए|
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए|


कोई वादा नहीं किया लेकिन,
क्यों तेरा इंतजार रहता है|
बेवजह जब क़रार मिल जाए,
दिल बड़ा बेकरार रहता है|

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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मटरू का आना और जाना!

मटरू का पता ही नहीं चलता कि कब वो हमारे, मतलब अपने घर में रहेगा और कब बाहर चला जाएगा| एक तरह से देखा जाए तो उसको आवारा कहा जा सकता है, कभी वो रात में अपने स्थान पर सोता है और सुबह होते ही चला जाता है, और कभी रात भर गायब रहता है और सुबह आ जाता है!

अब आपको बता दूँ कि मटरू एक कबूतर है, श्वेत- स्नो व्हाइट नहीं, ऑफ व्हाइट रंग का कबूतर| शुरू में इसके आने पर जब मैंने इसका नाम ‘मटरू’ रखा तब मेरी 6 साल की पोती ने कहा कि ये फ़ीमेल है| मैंने कहा कि अगर फ़ीमेल है तो इसका नाम बहुत पहले ‘चांदनी चौक टू चाइना’ फिल्म में रख दिया गया था- ‘मसक्कली’| लेकिन हम जेंडर के विवाद में नहीं फंसे और उसका नाम ‘मटरू’ ही स्वीकार कर लिया|

चलिए अपने और मटरू के स्थान का भी जिक्र करते हुए आगे बढ़ते हैं| लगभग एक माह पहले जब अन्य स्थानों के साथ-साथ गोवा में भी तूफान आया था, तब मटरू भी उड़ता हुआ हमारे घर आ गया था| हमारा घर या कहें कि फ्लैट, समुद्र के सामने ही छठे फ्लोर पर है| यहाँ हमारी बॉलकनी, जहां से समुद्र का नजारा और सूर्यास्त भी बहुत सुंदर दिखाई देता है, हालांकि मुझे नहीं लगता कि मटरू को इससे कुछ विशेष फर्क पड़ता होगा| हमारी बालकनी में जो स्प्लीट एसी का ब्लोअर है, उसके ऊपर मटरू ने अपना ठिकाना बना लिया|

शुरू में तो हमें लगा कि मटरू आया है, चला जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, शुरू में तो वह हमारे घर के अंदर अपनी बालकनी से दूसरे छोर की बालकनी तक एक-दो बार घूमा| बाद में उसको शायद समझ में आया कि घर के अंदर घूमना उसके लिए उचित नहीं है, वैसे हमारे घर में दो ‘डॉगी’ भी हैं| शुरू में तो हम फर्श पर मटरू के लिए खाना डालने के अलावा, ऊपर ब्लोअर पर भी खाना डालते थे, जहां वह निवास करता है| लेकिन वहाँ खाना डालने से यह खतरा और बढ़ जाता है कि बाहरी कबूतर और कौए उसको वहाँ से भगा देंगे|

लेकिन देखा जाए तो, जीवन में बहुत कठिनाइयाँ हैं, इन छोटे-छोटे प्राणियों के लिए भी| वैसे हमारे घर में पहले से ही बालकनी में कौओं-कबूतरों आदि के लिए दाना डाला जाता रहा है| अब वे जो बाहर के प्राणी हैं, उनको लगने लगा है कि इसके साथ विशेष व्यवहार क्यों किया जा रहा है| कुछ तो इनकी भीड़ में ऐसे भी होते हैं जो हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहते हैं| ऐसे में मटरू को सुरक्षित रखना और यह देखना भी मुश्किल हो जाता है कि वह भरपेट खाना खा ले|

हम लोग हमेशा बालकनी में तो नहीं रहते, हमारे दूर होने पर बाहर के ये योद्धा इसके साथ क्या करेंगे कोई अनुमान नहीं लगा सकता| इसलिए हम देखते हैं कि कभी तो वो सुबह से ही बाहर निकल जाता है और कभी रात में भी घर नहीं आता| जब तक वो यहाँ है, अक्सर शिकायत होती है कि कितनी गंदगी फैलाता है| क्योंकि हमारा काम हम करते हैं, उसको खाना खिलाने का, लेकिन अपना काम तो वो करेगा ही ना! और उसमें गंदगी भी फैलेगी!

खैर मटरू के बहाने कबूतरों में से ही कुछ से थोड़ी पहचान हुई, एक तो वह योद्धा जो सबसे लड़ता रहता है, एक और जो बहुत सुंदर है, श्वेत-श्याम रंग का और ध्यान से देखने पर मालूम हुआ कि उसका एक पंजा ही नहीं है| कैसे-कैसे कष्ट हर स्वरूप में प्राणी झेलते हैं, लेकिन उन सबके लिए हम क्या कर सकते हैं?

हाँ तो जैसे मैंने कहा कि कभी मटरू सुबह से ही निकल जाता है और हम सोचते हैं कि शायद अपना नया ठिकाना देखने गया है| लेकिन जो भी हो मटरू अभी भी हमारे साथ है, जब तक उसका मन हो रहेगा या जब तक इस कठिन जीवन को वह संभालकर रख पाए, क्योंकि खतरे तो हर प्राणी के लिए हैं, अलग तरह के|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Poetry

गीत भी कहीं न सो जाए!

आज मैं स्वर्गीय अज्ञेय जी द्वारा संपादित- काव्य संकलन- तारसप्तक में सम्मिलित प्रमुख कवि- स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| तारसप्तक हिन्दी कविता की विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था|

लीजिए प्रस्तुत है गिरिजाकुमार माथुर जी का यह गीत –


इतना मत दूर रहो
गंध कहीं खो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

देखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बाद
चम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपास
घूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा याद
बह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाश!


ले लो ये शब्द
गीत भी कहीं न सो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

उत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबें
खींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारें
टकराकर डूब गईं इच्छाओं की नावें
लौट-लौट आई हैं मेरी सब झनकारें|


नेह फूल नाजुक
न खिलना बन्द हो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

क्या कुछ कमी थी मेरे भरपूर दान में
या कुछ तुम्हारी नज़र चूकी पहचान में
या सब कुछ लीला थी तुम्हारे अनुमान में
या मैंने भूल की तुम्हारी मुस्कान में|


खोलो देह-बंध
मन समाधि-सिंधु हो जाए|
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

इतना मत दूर रहो
गंध कहीं खो जाए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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Film Song

सदा खुश रहे तू !

आज मैं फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘प्यार का सागर’ के लिए मुकेश जी ने रवि जी के संगीत निर्देशन में गाया था,इस गीत के रचनाकार थे प्रेम धवन जी|

लीजिए प्रस्तुत है यह गीत, जो इतना समय बीत जाने के बाद, आज भी लोगों को याद है –

सदा खुश रहे तू जफ़ा करने वाले
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले|

सुनाते ग़म-ए-दिल, जो तुम पास होते
मेरी बेकसी पे भी क्या तुम न रोते

मगर क्या दिखाएं तुम्हे दिल के छाले
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले
सदा खुश रहे तू|

सितम और भी हों तो वो भी किये जा
हो ग़म और भी हों तो वो भी दिए जा
नहीं फिर भी तुझसे गिला करने वाले|
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले||

सदा खुश रहे तू, जफ़ा करने वाले
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Poetry

याद केवल आदेश!

आज फिर से मैं अपने बहुत प्रिय गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा सौभाग्य है कि मुझे अनेक बार उनका स्नेह और सानिध्य प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ था|

आज के गीत में उन्होंने बताया है कि जब व्यक्ति दफ्तर के रूटीन के हवाले हो जाता है, तब वह जीवन में आनंद की बहुत सी स्थितियों से दूर हो जाता है|
लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

झुके फाइलों पर अब, घुंघराले केश
बिसरे संदेश, याद केवल आदेश।

भोर ही निकलते हम
कांधे पर सूर्य लिए
दफ्तर से घर तक हम ढोते हैं शाम
अंधियारी गलियों में
दरवाजे पर अंकित
पढ़ा नहीं जाता फिर अपना ही नाम
मन नहीं भटकता अब परियों के देश
बिसरे सन्देश, याद केवल आदेश।


तारे अब लगते हैं
चावल के दानों से
अनचाहे आस-पास बढ़ रहा है उधार
पहली तिथि, पन्द्रह दिन
पहले आ जाये तो
पन्द्रह दिन आयु घटाने को तैयार
फबता है साबुन से उजलाया वेश
बिसरे सन्देश, याद केवल आदेश।

इन्द्रधनुष को देखे
कितने ही बरस हुए
अर्थ नहीं रखता कुछ प्रात का समीर
जाने कितने पीछे
छूट गया वंशीवट
खो गया कुहासे में यमुना का तीर
हम न किसी राधा के द्वरिका-नरेश
बिसरे सन्देश, याद केवल आदेश।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा !

विख्यात फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी जी एक अच्छी शायरा भी थीं और कविता की कद्रदान भी थीं| वास्तव मेँ कवि नीरज जी को फिल्मी दुनिया मेँ ले जाने वाली भी वही थीं |

आज मैं मीना कुमारी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ-, प्रस्तुत है यह ग़ज़ल-

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा,
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा|

बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा|

ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा
|

हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें कहाँ तन्हा|

जलती-बुझती-सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा-सा एक मकाँ तन्हा|

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Writing and Re-writing of History!

It’s true that image creation for self is what the rulers like the most. For this they have been using the writers and historians also.

Till now the job of image creation, writing in favour of those in power was in the hands of some communist authors, historians etc. who did, whatever suited to those in power at that time and got rewarded and honoured at regular intervals. There was no problem till now, since everything was going as per the wishes of the rulers, who felt that they are always going to remain in power, in India.

When other party, people of other school of thought came to power, the problem arose, those holy cows felt themselves in danger, they even returned the awards etc. for earning which, their loyalty towards those in power earlier played a major role.

The things which these intellectuals(?) did for earning these awards, like these historians, never mentioned how Sardar Patel and Netaji Subhash Chandra Bose were kept away from power. Bhagat Singh and Netaji were even termed as ‘terrorists’. These great loyalists never had any objection to that.

Nehru never acquired the respect and height that Sardar Patel had in party, but he was put in the seat of power, since his mentor Gandhi Ji wanted that. Netaji was forced to leave India never allowed to come back to India, until he was alive.

The sacrifice that people like Bhagat Singh, Netaji Subhash Chandra Bose made was far greater than Nehru Ji, even Mahatma Gandhi and their fellows made. But they were never given a respectable space in the history created by these loyal writers.

In case of Moghul empire, Kings like Aurangzeb and many others were given very respectable mentions in the history ‘created’ by these untiring loyal creators of history and roads etc. were given their name, just to earn votes by the congress governments.

Now since there has been a big change in the Indian ruling class, people with a different ideology are in power, so there is a big reaction to whatever has been done in the past, in the name of history and remembering the past heroes.

Yes reaction can sometimes go much far but it is a reaction, so those who admire the past ‘historians’ have a strong objection to the names of roads etc. being changes and warriors like Maharana Pratap, Shivaji Maharaj and many freedom fighters finding a place in the history. There have been instances where Hindu gods have been mentioned with disrespect in course books, but these liberals never had a complaint on that! Because they feel that anything related to Hindus is ‘communal’.

Yes, the dictator type people want that they should find a mention in the history, the way they want to be remembered. You want an example, it was the ‘Time Capsule’ that was placed underground during the regime of Mrs. Indira Gandhi, and nobody knew the contents, until it was taken out after change of government.

Today it is a more liberal environment, which the so called ‘liberals’ would never accept. Today if anything you feel is wrong, even renaming of a road, one can move the courts and challenge that.

These are my views based on an ‘IndiSpire’ prompt – Mr Bhakt wakes up in a dream. Who controls the past controls the future, he is told. He starts rewriting history… #TwistInHistory

Thanks for reading.


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मुझको ये वहम नहीं है कि खु़दा है मुझमें !

अभिव्यक्ति की- गीत, कविता, शायरी की दुनिया कितनी व्यापक है, ज़िंदगी के कितने रंग हम इसमें देख सकते हैं, यह वास्तव में अद्वितीय है| इसी क्रम में आज मैं राजेश रेड्डी जी की एक और ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री राजेश रेड्डी जी की यह ग़ज़ल-


आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमें,
मुझको ये वहम नहीं है कि खु़दा है मुझमें|

मेरे चहरे पे मुसलसल हैं निगाहें उसकी,
जाने किस शख़्स को वो ढूँढ रहा है मुझमें|

हँसना चाहूँ भी तो हँसने नहीं देता मुझको,
ऐसा लगता है कोई मुझसे ख़फ़ा है मुझमें|

मैं समुन्दर हूँ उदासी का अकेलेपन का,
ग़म का इक दरिया अभी आके मिला है मुझमें|


इक ज़माना था कई ख्वाबों से आबाद था मैं,
अब तो ले दे के बस इक दश्त बचा है मुझमें|

किसको इल्ज़ाम दूँ मैं किसको ख़तावार कहूँ,
मेरी बरबादी का बाइस तो छुपा है मुझमें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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