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तेरे घर में आईना भी है!

आज मैं स्वर्गीय राहत इन्दौरी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| ग़ज़ल की खूबसूरती इसमें होती है कि कम शब्दों में सादगी के साथ बड़ी बात कह दी जाती है और राहत इन्दौरी साहब इस काम में पूरी तरह माहिर थे|

लीजिए प्रस्तुत है ज़नाब राहत इन्दौरी साहब की यह ग़ज़ल-

जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है,
वो शख्स, सिर्फ भला ही नहीं, बुरा भी है|

मैं पूजता हूँ जिसे, उससे बेनियाज़ भी हूँ,
मेरी नज़र में वो पत्थर भी है खुदा भी है|

सवाल नींद का होता तो कोई बात ना थी,
हमारे सामने ख्वाबों का मसअला भी है|


जवाब दे ना सका, और बन गया दुश्मन,
सवाल था, के तेरे घर में आईना भी है?

ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन,
ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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