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गीत भी कहीं न सो जाए!

आज मैं स्वर्गीय अज्ञेय जी द्वारा संपादित- काव्य संकलन- तारसप्तक में सम्मिलित प्रमुख कवि- स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| तारसप्तक हिन्दी कविता की विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था|

लीजिए प्रस्तुत है गिरिजाकुमार माथुर जी का यह गीत –


इतना मत दूर रहो
गंध कहीं खो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

देखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बाद
चम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपास
घूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा याद
बह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाश!


ले लो ये शब्द
गीत भी कहीं न सो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

उत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबें
खींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारें
टकराकर डूब गईं इच्छाओं की नावें
लौट-लौट आई हैं मेरी सब झनकारें|


नेह फूल नाजुक
न खिलना बन्द हो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

क्या कुछ कमी थी मेरे भरपूर दान में
या कुछ तुम्हारी नज़र चूकी पहचान में
या सब कुछ लीला थी तुम्हारे अनुमान में
या मैंने भूल की तुम्हारी मुस्कान में|


खोलो देह-बंध
मन समाधि-सिंधु हो जाए|
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

इतना मत दूर रहो
गंध कहीं खो जाए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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