मटरू का आना और जाना!

मटरू का पता ही नहीं चलता कि कब वो हमारे, मतलब अपने घर में रहेगा और कब बाहर चला जाएगा| एक तरह से देखा जाए तो उसको आवारा कहा जा सकता है, कभी वो रात में अपने स्थान पर सोता है और सुबह होते ही चला जाता है, और कभी रात भर गायब रहता है और सुबह आ जाता है!

अब आपको बता दूँ कि मटरू एक कबूतर है, श्वेत- स्नो व्हाइट नहीं, ऑफ व्हाइट रंग का कबूतर| शुरू में इसके आने पर जब मैंने इसका नाम ‘मटरू’ रखा तब मेरी 6 साल की पोती ने कहा कि ये फ़ीमेल है| मैंने कहा कि अगर फ़ीमेल है तो इसका नाम बहुत पहले ‘चांदनी चौक टू चाइना’ फिल्म में रख दिया गया था- ‘मसक्कली’| लेकिन हम जेंडर के विवाद में नहीं फंसे और उसका नाम ‘मटरू’ ही स्वीकार कर लिया|

चलिए अपने और मटरू के स्थान का भी जिक्र करते हुए आगे बढ़ते हैं| लगभग एक माह पहले जब अन्य स्थानों के साथ-साथ गोवा में भी तूफान आया था, तब मटरू भी उड़ता हुआ हमारे घर आ गया था| हमारा घर या कहें कि फ्लैट, समुद्र के सामने ही छठे फ्लोर पर है| यहाँ हमारी बॉलकनी, जहां से समुद्र का नजारा और सूर्यास्त भी बहुत सुंदर दिखाई देता है, हालांकि मुझे नहीं लगता कि मटरू को इससे कुछ विशेष फर्क पड़ता होगा| हमारी बालकनी में जो स्प्लीट एसी का ब्लोअर है, उसके ऊपर मटरू ने अपना ठिकाना बना लिया|

शुरू में तो हमें लगा कि मटरू आया है, चला जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, शुरू में तो वह हमारे घर के अंदर अपनी बालकनी से दूसरे छोर की बालकनी तक एक-दो बार घूमा| बाद में उसको शायद समझ में आया कि घर के अंदर घूमना उसके लिए उचित नहीं है, वैसे हमारे घर में दो ‘डॉगी’ भी हैं| शुरू में तो हम फर्श पर मटरू के लिए खाना डालने के अलावा, ऊपर ब्लोअर पर भी खाना डालते थे, जहां वह निवास करता है| लेकिन वहाँ खाना डालने से यह खतरा और बढ़ जाता है कि बाहरी कबूतर और कौए उसको वहाँ से भगा देंगे|

लेकिन देखा जाए तो, जीवन में बहुत कठिनाइयाँ हैं, इन छोटे-छोटे प्राणियों के लिए भी| वैसे हमारे घर में पहले से ही बालकनी में कौओं-कबूतरों आदि के लिए दाना डाला जाता रहा है| अब वे जो बाहर के प्राणी हैं, उनको लगने लगा है कि इसके साथ विशेष व्यवहार क्यों किया जा रहा है| कुछ तो इनकी भीड़ में ऐसे भी होते हैं जो हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहते हैं| ऐसे में मटरू को सुरक्षित रखना और यह देखना भी मुश्किल हो जाता है कि वह भरपेट खाना खा ले|

हम लोग हमेशा बालकनी में तो नहीं रहते, हमारे दूर होने पर बाहर के ये योद्धा इसके साथ क्या करेंगे कोई अनुमान नहीं लगा सकता| इसलिए हम देखते हैं कि कभी तो वो सुबह से ही बाहर निकल जाता है और कभी रात में भी घर नहीं आता| जब तक वो यहाँ है, अक्सर शिकायत होती है कि कितनी गंदगी फैलाता है| क्योंकि हमारा काम हम करते हैं, उसको खाना खिलाने का, लेकिन अपना काम तो वो करेगा ही ना! और उसमें गंदगी भी फैलेगी!

खैर मटरू के बहाने कबूतरों में से ही कुछ से थोड़ी पहचान हुई, एक तो वह योद्धा जो सबसे लड़ता रहता है, एक और जो बहुत सुंदर है, श्वेत-श्याम रंग का और ध्यान से देखने पर मालूम हुआ कि उसका एक पंजा ही नहीं है| कैसे-कैसे कष्ट हर स्वरूप में प्राणी झेलते हैं, लेकिन उन सबके लिए हम क्या कर सकते हैं?

हाँ तो जैसे मैंने कहा कि कभी मटरू सुबह से ही निकल जाता है और हम सोचते हैं कि शायद अपना नया ठिकाना देखने गया है| लेकिन जो भी हो मटरू अभी भी हमारे साथ है, जब तक उसका मन हो रहेगा या जब तक इस कठिन जीवन को वह संभालकर रख पाए, क्योंकि खतरे तो हर प्राणी के लिए हैं, अलग तरह के|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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