ओर छोर छप्पर का टपके!

आज वरिष्ठ कवि और बहुत अच्छे इंसान- श्री सत्यनारायण जी के बारे में कुछ बात करूंगा, जो एक श्रेष्ठ कवि हैं, पटना में रहते हैं, शत्रुघ्न सिन्हा जी के मित्र और पड़ौसी हैं और सबसे बड़ी बात कि साहित्यिक गरिमा के साथ कवि सम्मेलन का श्रेष्ठ संचालन करते हैं|

पहली बार मैंने उनके संचालन में हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के झारखंड क्षेत्र स्थित कॉम्प्लेक्स में कवि सम्मेलन सुना था, तब से मेरा उनको पुनः संचालन एवं कविता पाठ हेतु बुलाने का मन था| एनटीपीसी की विंध्याचल परियोजना में उनको बुलाने का अवसर मिला|

एक बात और उस समय आज जैसी इंटरनेट, मोबाइल आदि की सुविधाएं नहीं थी और मैं अक्सर कवियों के घर पर ही आमंत्रित करने के लिए जाता था| इस प्रकार मुझे अन्य अनेक लोगों के अलावा नीरज जी, मुंबई में व्यंग्यकार- शरद जोशी जी आदि के घर भी जाने का अवसर मिला|

श्री सत्यनारायण जी के ‘कदम कुआं’ स्थित आवास पर भी मैं गया था और शत्रुघ्न सिन्हा का पड़ौस भी देख लिया था| वैसे सत्यनारायण जी ने शत्रुघ्न सिन्हा की किसी फिल्म, शायद- ‘काला पत्थर’ में गीत भी लिखे हैं|

उनकी कविता शेयर करने से पहले एक दो संस्मरण और- मैं पटना एक बार घूमने गया था तब सत्यनारायण जी से, जिस होटल में मैं रुका था वहाँ मुलाकात हुई थी| हमने काफी लंबी बैठक की थी, और मैंने उनको जगजीत सिंह जी की गायी हुई ग़ज़ल सुनाई थी, जिसको उन्होंने बहुत सराहा था, उस समय मुझे भी यह नहीं मालूम था कि वह निदा फ़ाज़ली साहब की लिखी हुई है और उन्होंने तो तब तक उसे सुना ही नहीं था, लेकिन सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए थे और बोले थे कि निश्चित रूप से किसी बहुत अच्छे कवि-शायर ने इसे लिखा होगा| यह ग़ज़ल थी- ‘गरज बरस प्यासी धरती को फिर पानी दे मौला’|

मिलने पर वे यही बोलते थे कि कवि सम्मेलन तो चलते रहते हैं, इस बहाने हम लोग आपस में मिल लेते हैं, ये बड़ी बात है|

अब उनकी कविता शेयर करने से पहले एक बात और कहूँगा ऊंचाहार के कवि सम्मेलन में नीरज जी भी थे और उन्होंने सत्यनारायण जी के संचालन और उनके काव्य-पाठ की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी|

मैं 2010 में एनटीपीसी से रिटायर हो गया था, उससे पहले ही सत्यनारायण जी से मुलाकात हुई थी, कामना करता हूँ कि वे स्वस्थ एवं प्रसन्न हों| उनका नवगीत संकलन है – ‘सभाध्यक्ष हँस रहा है’|

अब प्रस्तुत है उनका एक नवगीत-

सूने घर में
कोने-कोने
मकड़ी बुनती जाल

अम्मा बिन
आँगन सूना है
बाबा बिन दालान,
चिट्ठी आई है
बहिना की
साँसत में है जान,
नित-नित

नए तगादे भेजे
बहिना की ससुराल ।


भ‍इया तो
परदेश विराजे
कौन करे अब चेत,
साहू के खाते में
बंधक है
बीघा भर खेत,
शायद
कुर्की ज़ब्ती भी
हो जाए अगले साल ।


ओर छोर
छप्पर का टपके
उनके काली रात,
शायद अबकी
झेल न पाए
भादों की बरसात
पुरखों की
यह एक निशानी
किसे सुनाए हाल ।


फिर भी
एक दिया जलता है
जब साँझी के नाम,
लगता
कोई पथ जोहे
खिड़की के पल्ले थाम,
बड़ी-बड़ी दो आँखें
पूछें
फिर-फिर वही सवाल ।


सूने घर में
कोने-कोने
मकड़ी बुनती जाल ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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