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तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ!

सूर्यभानु गुप्त जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| सूर्यभानु जी की ग़ज़लों में वह चमत्कार अक्सर शामिल होता है, जिसकी अच्छी कविता से उम्मीद की जाती है|

उनकी एक बहुत खूबसूरत ग़ज़ल जो मैंने पहले शेयर की है, उसका एक शेर दोहराना चाहूँगा-

एक अच्छा शेर कह के मुझको ये महसूस हुआ,
बहुत दिनों के लिए, फिर से मर गया हूँ मैं|


अभिव्यक्ति की ईमानदारी और प्रभाविता के लिए प्रतिबद्ध शायर ही यह बात कह सकता है|
लीजिए आज सूर्यभानु गुप्त जी की इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं-

हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ,
मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ|

मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी,
मेरा वुजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूँ|

रिश्ते गुज़र रहे हैं लिए दिन में बत्तियाँ,
मैं बीसवीं सदी की अँधेरी सुरंग हूँ|

निकला हूँ इक नदी-सा समन्दर को ढूँढ़ने,
कुछ दूर कश्तियों के अभी संग-संग हूँ|


माँझा कोई यक़ीन के क़ाबिल नहीं रहा,
तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ|

ये किसका दस्तख़त है, बताए कोई मुझे,
मैं अपना नाम लिख के अँगूठे-सा दंग हूँ |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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2 replies on “तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ!”

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