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कल फिर सुबह नई होगी!

माननीय रामदरश मिश्र जी ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने साहित्य की लगभग हर विधा में लिखा है| अनेक सम्मानों से विभूषित रामदरश जी ने आम आदमी की स्थितियों का चित्रण बड़ी बारीकी से किया है|

लीजिए आज मैं रामदरश जी का यह आशावादी गीत शेयर कर रहा हूँ –

दिन को ही हो गई रात-सी, लगता कालजयी होगी
कविता बोली- “मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी।”

गली-गली कूड़ा बटोरता, देखो बचपन बेचारा
टूटे हुए ख्वाब लादे, फिरता यौवन का बनजारा
कहीं बुढ़ापे की तनहाई, करती दई-दई होगी!

जलती हुई हवाएँ मार रही हैं चाँटे पर चाँटा
लेट गया है खेतों ऊपर यह जलता-सा सन्नाटा
फिर भी लगता है कहीं पर श्याम घटा उनई होगी!


सोया है दुर्गम भविष्य चट्टान सरीखा दूर तलक
जाना है उस पार मगर आँखें रुक जाती हैं थक-थक
खोजो यारो, सूने में भी कोई राह गई होगी!

टूटे तारों से हिलते हैं यहाँ-वहाँ रिश्ते-नाते
शब्द ठहर जाते सहसा इक-दूजे में आते-जाते
फिर भी जाने क्यों लगता- कल धरती छंदमयी होगी!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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