टोले के कवि!

मैं पिछले दिनों (फ़ेसबुक पर) अपनी पुरानी कुछ कविताएं शेयर कर रहा था, परंतु आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ, वह पुराना नहीं, अभी का है|

एक पुरानी घटना याद आ रही है, मैं उस समय अपने संस्थान के लिए कवि-सम्मेलन आयोजित करता था| उस समय मंच के एक कवि थे- निर्भय हाथरसी, वे इतने लोकप्रिय थे कि उनके रहते अन्य कवि मंच पर जम नहीं पाते थे|

उस समय एक कवि ने मुझे पत्र लिखकर कहा कि अगर आप निर्भय हाथरसी जी को बुलाएंगे तो ये 100 से ज्यादा कवि नहीं आएंगे, और उन्होंने कवियों की एक लंबी सूची भेजी थी|

बस कवियों की यह असुरक्षा की भावना याद आई और कुछ अनुभव याद आ गए और ये गीत प्रकट हो गया|

लीजिए यह गीत प्रस्तुत है-

टोले के कवि हो तुम, बाहर मत झांकना!

मिल-जुलकर हम सबको ऊपर उठना है,
एक दूसरे की प्रशस्ति सदा करना है|
मुश्किल पहचान बनाना सबको अपनी,
इसके लिए भी अभियान एक चलना है|

यदि बाहर की रचना भा जाए तब भी,
आँख मूंदकर हम सबको आगे बढ़ना है|
टोले के कवि हैं, सबके उद्धारक नहीं,
अपना ही कीर्ति-ध्वज हमें ऊंचा करना है|

यह टोला हमसे, हम सब हैं इस टोले से,
और भी कुछ है तो, जो उसमें हैं वह जानें,
हमको मिल-जुलकर अपनी जड़ें जमानी हैं,
और किसी का तो उल्लेख नहीं करना है|

कविता का जो होगा, वह खुद हो जाएगा,
हमको बाहर अपना पाँव नहीं धरना है,
मिल-जुलकर जब हम बन जाएंगे महाकवि,
तब बाहर का कोई विचार हमें करना है|

यह है कवियों का सहकारी आंदोलन,
किसी तरह भी इसको क्षीण नहीं करना है|
सब मिल अंधे, लंगड़े, बहरे ज्यों साथ बढ़ें,
इस कथा को भी यथार्थ हमें करना है|

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’



आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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2 thoughts on “टोले के कवि!”

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