सूर्यमुखी का प्रण!

अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में आज यह अंतिम पुरानी रचना है, जो बहुत प्रयास करने पर भी पूरी याद नहीं आ सकी| इसे मैं कुछ जगह इसकी तुरपाई करने के बाद प्रस्तुत कर रहा हूँ|

इस रचना में मैंने जीवन के, दिन के और मौसम के तीन चरणों को एक साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है|

लीजिए प्रस्तुत हैं आज की रचना-

प्रिय तेरा विश्वास लिए मैं कब से सोच रहा हूँ,
सूर्यमुखी के प्रण पर मुझे हँसी किसलिए आई|

बन कागज की नाव, तैरतीं बालक की आशाएं,
इंद्रधनुष के रंग निरूपित करते नव-उपमाएं,
उदित सूर्य की किरणों में बचपन को खोज रहा हूँ,
ताकि कर सकूँ उस सपने की, हल्की सी तुरपाई|

सूरज तपता, धरती तपती, चलतीं गर्म हवाएं,
ताप-ताप संयोग, चैन से कैसे समय बिताएं,
भीतर-बाहर ताप लिए आकुल हो खोज रहा हूँ,
वह आंचल की छाँव जहां यौवन पाए ठंडाई |


धुंधलाया आकाश, धरा अलसाई सी लगती है,
प्रकृति ठिठुरती किन्तु सूर्य को जाने की जल्दी है,
तुलसी की मंजरियों में, स्मृतियों को सूंघ रहा हूँ,
ताकि पा सकूं बीते कल की हल्की सी परछाईं|


सूर्यमुखी के प्रण पर मुझको हँसी किसलिए आई||

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

*****

2 thoughts on “सूर्यमुखी का प्रण!”

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