ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया!

आज मन हो रहा कि संत कबीर दास जी को याद कर लें| कवि-कलाकार आदि आज की ज़िंदगी का चित्रण अपने हिसाब से करते रहते हैं और हम उनकी प्रस्तुति को देखते/पढ़ते रहते हैं| आज देखते हैं कि संत कबीर दास जी के इस बारे में क्या विचार हैं| वैसे इस भजन की पंक्तियों का अनेक फिल्मी गीतों आदि में भी प्रयोग किया गया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, संत कबीर साहब का यह भजन–



झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥
काहे कै ताना काहे कै भरनी,
कौन तार से बीनी चदरिया ॥ १॥

इडा पिङ्गला ताना भरनी,
सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ २॥

आठ कँवल दल चरखा डोलै,
पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ ३॥

साँ को सियत मास दस लागे,
ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ ४॥

सो चादर सुर नर मुनि ओढी,
ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥ ५॥

दास कबीर जतन करि ओढी,
ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥ ६॥


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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