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फिर-फिर वही सन्नाटा है!

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी अपने समय में हिन्दी के प्रमुख कवियों में शामिल थे तथा प्रतिष्ठित समाचार-पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में भी थे| सर्वेश्वर जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए थे|

आज मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह ग़ज़ल –


अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है,
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है|

जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है|

होश अपना भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त,
द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है|

शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा,
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है|

देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है|

हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में,
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है|

दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की,
आप ही रोता है औ आप ही समझाता है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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