जैसे जैसे घर नियराया!

आज मैं श्रेष्ठ नवगीत एवं ग़ज़ल लेखक स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक छोटा सा और खूबसूरत नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| किस प्रकार हम अनेक प्रकार से अपने घर से जुड़े होते हैं| पुराने ग्रामीण परिवेश को याद करके इस गीत का और भी अच्छा आस्वादन किया जा सकता है|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत –

जैसे-जैसे घर नियराया।

बाहर बापू बैठे दीखे
लिए उम्र की बोझिल घड़ियां।
भीतर अम्मा रोटी करतीं
लेकिन जलती नहीं लकड़ियां।


कैसा है यह दृश्य कटखना
मैं तन से मन तक घबराया।

दिखा तुम्हारा चेहरा ऐसे
जैसे छाया कमल-कोष की।
आंगन की देहरी पर बैठी
लिए बुनाई थालपोश की।


मेरी आंखें जुड़ी रह गईं
बोलों में सावन लहराया।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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