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विषबुझे खंजर न फेंक!

आज एक बार फिर से मैं अपने अग्रज और मेरे लिए गुरुतुल्य रहे श्रेष्ठ नवगीत एवं ग़ज़ल लेखक स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ|

लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की यह ग़ज़ल –


दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक,
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक|


हो सके तो चल किसी की आरजू के साथ-साथ,
मुस्कराती ज़िंदगी पर मौत का मंतर न फेंक|

जो धरा से कर रही हैं कम गगन का फासला,
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक|


फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल,
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक|

यह तेरी काँवर नहीं कर्तव्य का अहसास है,
अपने कंधे से श्रवण! संबंध का काँवर न फेंक|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 replies on “विषबुझे खंजर न फेंक!”

धन्यवाद जी, मेरे लिए वे बड़े भाई समान थे।

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