सियासत अंधेरों का घर हो गई!

हिन्दी काव्य मंचों के प्रसिद्ध गीतकार जो ओजपूर्ण कविता और सरस गीतों के लिए प्रसिद्ध थे, स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी की लिखी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| मैंने पहले भी शेयर किए हैं, आज प्रस्तुत है यह गीत|

रचना अपना परिचय स्वयं देती है, लीजिए प्रस्तुत है यह प्रेम में कुछ अलग ही परिस्थितियों का गीत-


ज़िंदगी एक-रस किस क़दर हो गई,
एक बस्ती थी वो भी शहर हो गई|

घर की दीवार पोती गई इस तरह,
लोग समझें कि लो अब सहर हो गई|

हाय इतने अभी बच गए आदमी,
गिनते-गिनते जिन्हें दोपहर हो गई|

कोई खुद्दार दीपक जले किसलिए,
जब सियासत अंधेरों का घर हो गई|


कल के आज के मुझ में यह फ़र्क है,
जो नदी थी कभी वो लहर हो गई|

एक ग़म था जो अब देवता बन गया,
एक ख़ुशी है कि वह जानवर हो गई|

जब मशालें लगातार बढ़ती गईं,
रौशनी हारकर मुख्तसर हो गई|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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