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बतावत आपनो नाम सुदामा!

नरोत्तम दास जी द्वारा लिखित ‘सुदामा चरित’ का प्रसंग आज याद आ रहा है| बचपन में अपनी पाठ्य पुस्तकों में हम यह प्रसंग पढ़ चुके हैं| शायद यह भी सही है कि उस समय हमारा मन इतना पवित्र होता है कि इस तरह के प्रसंग हमारे कोमल मन में गहरा स्थान बना लेते हैं|


ऐसे ही मन में खयाल आता है कि आज जो राजकीय भवन हैं, बड़े-बड़े शासकीय कार्यालय हैं, गरीब आदमी उनके सामने से गुजरते हुए भी डरता है जबकि किसी घोटालेबाज, स्मगलर आदि के लिए शायद उस भवन में रहने वाला उच्च अधिकारी अथवा नेता स्वयं उसे रिसीव करने के लिए द्वार पर आ जाता है|

खैर आज का प्रसंग है द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण के बचपन के सखा सुदामा का, जो अपनी पत्नी द्वारा बार-बार यह कहे जाने पर कि आपके मित्र श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश हो गए हैं, इतने संपन्न हैं और हम लोग इतनी दरिद्रता का जीवन बिता रहे हैं, आप उनके पास जाओ और अपने लिए कुछ सहायता मांग लो, वो अवश्य सहायता करेंगे|

अब आज की इस कविता का प्रसंग, सुदामा श्रीकृष्ण जी के महल पहुंचते हैं, वहाँ द्वारपाल उनको देखता है, एक कृषकाय मनुष्य, जिसके शरीर पर ढंग के कपड़े नहीं हैं, नंगे पैर है वह महल के द्वार पर आता है और कहता है कि उसको द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण से मिलना|

आश्चर्य चकित वह द्वारपाल जाकर श्रीकृष्ण जी को यह समाचार देता है और बालसखा सुदामा का नाम सुनते ही श्रीकृष्ण नंगे पांव उसका स्वागत करने पहुँच जाते हैं| उसका खूब आदर सत्कार करते हैं, हर तरह की सुविधाओं का उसको उपभोग कराते हैं| गरीब सुदामा संकोच के कारण यह भी नहीं कह पाता कि वह क्या मांगने के लिए आया था और जब लौटने का समय आता है, तब भी वह सोचता रहता है कि उसकी गरीब पत्नी कैसे कष्ट भोग रही होगी और वह उसकी इच्छा के अनुसार श्रीकृष्ण से कुछ नहीं मांग पाया, वापस जाकर वह क्या जवाब देगा|

पछताता हुआ वह अपने गाँव पहुंचता है और अपनी कुटिया को वहाँ नहीं देखकर अचंभित हो रहा होता है, तभी वहाँ बने भव्य भवन में से उसकी पत्नी उसको इशारा करके बुलाती है| कृपासिन्धु श्रीकृष्ण सुदामा के कहे बिना ही उसे वे सभी सुविधाएं उपलब्ध करा देते हैं, जिनकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता था|

यह प्रसंग ऐसा है कि इसको याद करके ही आँखों में आँसू आ जाते हैं, लीजिए यह प्रसंग थोड़ा सा कविता के रूप में पढ़ लेते हैं-


शीश पगा न झगा तन में प्रभु
जाने को आहि बसे केहि ग्रामा ।
धोती फटी -सी लटी दुपटी,
अरु पाय उपानह को नहीं सामा ॥
द्वार खड़ा द्विज दुर्बल एक,
रह्यो चकिसों वसुधा अभिरामा ।
पूछत दीनदयाल को धाम,
बतावत आपनो नाम सुदामा ॥

ऐसे बेहाल बिवाइन सों,
पग कंटक जाल लगे पुनि जोए।
हाय! महादुख पायो सखा,
तुम आए इतै न कितै दिन खोए॥
देखि सुदामा की दीन दसा,
करुना करिकै करुनानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं,
नैनन के जल सों पग धोए॥



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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3 replies on “बतावत आपनो नाम सुदामा!”

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