Categories
Uncategorized

वर्ना रो पड़ोगे!

आज एक बार फिर मैं अपने अग्रज और गुरु तुल्य तथा हिन्दी काव्य मंचों के प्रसिद्ध गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

रचना अपना परिचय स्वयं देती है, लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह गीत-


बंद होंठों में छुपा लो
ये हँसी के फूल
वर्ना रो पड़ोगे।

हैं हवा के पास
अनगिन आरियाँ
कटखने तूफान की
तैयारियाँ
कर न देना आँधियों को
रोकने की भूल
वर्ना रो पड़ोगे।

हर नदी पर
अब प्रलय के खेल हैं
हर लहर के ढंग भी
बेमेल हैं
फेंक मत देना नदी पर
निज व्यथा की धूल
वर्ना रो पड़ोगे।

बंद होंठों में छुपा लो
ये हँसी के फूल
वर्ना रो पड़ोगे।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

4 replies on “वर्ना रो पड़ोगे!”

Leave a Reply