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लेकिन मकाँ नहीं मिलता!

निदा फ़ाज़ली साहब मेरे अत्यंत प्रिय शायर रहे हैं| उनमें कवि-शायर और संत, सबके गुण शामिल थे| क्या दोहे, क्या ग़ज़लें और क्या गीत, हर जगह उन्होंने अपना कमाल दिखाया था| उनकी प्रमुख विशेषता थी सरल भाषा में गहरी बात कहना|

लीजिए आज निदा फ़ाज़ली साहब की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-



कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता|

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले,
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता|

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो,
जहाँ उमीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता|

कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें,
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता|

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं,
ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता|


चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है,
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता|

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है,
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबा नहीं मिलता|

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,
जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 replies on “लेकिन मकाँ नहीं मिलता!”

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