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कवियों के कंकाल!

कृष्ण कल्पित जी मेरे अत्यंत प्रिय मित्र रहे हैं| मैं 1980 से 1983 तक आकाशवाणी, जयपुर में कार्यरत था, उस दौरान ही मेरा युवा कवि कृष्ण कल्पित जी से परिचय हुआ, वैसे मैं भी उस समय युवा था, उनसे कुछ वर्ष बड़ा था| उस समय कल्पित जी का एक गीत बहुत प्रसिद्ध था उसकी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं –


राजा-रानी, प्रजा, मंतरी, बेटा इकलौता
मां से कथा सुनी थी, जिसका अंत नहीं होता|

बिना कहे महलों में कैसे आई पुरवाई,
राजा ने दस-बीस जनों को फांसी लगवाई|
राम-राम रटता रहता था, राजा का तोता|


कल्पित जी से संबंधित एक और बात याद आ रही है| जयपुर की नौकरी छोड़ने के बाद मैं हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी इकाई में कार्य करने लगा जो झारखंड क्षेत्र में स्थित थी, जो बाद में अलग राज्य बना और कल्पित जी ने आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्पादक के रूप में कार्यग्रहण किया और उनकी तैनाती रांची आकाशवाणी केंद्र में हुई, जिसके क्षेत्र में हमारी परियोजना भी आती थी | कल्पित जी को यह मालूम हुआ कि मैं इस परियोजना में हूँ और राजभाषा का काम तो मैं पहले से देखता था, उन्होंने अनुमान से मेरे नाम कविता-पाठ का एक अनुबंध बनाकर भेज दिया कि अगर मैं वहाँ हूँ, तो कविता-पाठ के लिए आ जाऊंगा| इस प्रकार मैं जब तक वहाँ था, समय-समय पर आकाशवाणी-रांची कविता पाठ हेतु जाता रहा|

काफी समय बाद मुझे मालूम हुआ, वे दिल्ली स्थित आकाशवाणी महानिदेशालय में काफी ऊंचे पद पर कार्यरत थे, (अब तक तो शायद सेवानिवृत्त हो गए होंगे, ) लेकिन फिर उनसे मिलना नहीं हो पाया, मैं तो अब वैसे ही गोवा में आकर सबसे दूर हो गया हूँ |

लीजिए आज मेरे पुराने मित्र और श्रेष्ठ कवि कृष्ण कल्पित जी की इस कविता का आनंद लीजिए-


मैं देखना चाहता था कि
शब्दों में कितनी शक्ति बची हुई है

बेचैनी में कितनी बेचैनी
शान्ति में कितनी शान्ति

मैंने देखा प्यार नामक शब्द में
कुछ जलने की गन्ध आ रही थी

झूठ अब उतना झूठा नहीं रहा था
जितने महान थे उतने टुच्चे थे,
लुच्चे थे

जितने भी सदाचारी थे

सच्चाई पर अब किसी को यक़ीन नहीं था
धीरज में धैर्य गायब था

पानी अब प्यास नहीं बुझाता था
अग्नि के साथ-साथ चलता था अग्नि-शमन दस्ता

शब्दों के सिर्फ़ खोखल बचे थे
उनका अर्थ सूख गया था


जब भी लिखता था कविता
एक संरचना हाथ आती थी

कवि अब कहाँ थे
हर तरफ़ कवियों के कंकाल थे !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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