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चांदनी जगाती है!

हिन्दी साहित्य का एक जगमगाता सितारा थे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी| विख्यात साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ का सफल संपादन तो उन्होंने लंबे समय तक किया ही, उनका अमूल्य योगदान साहित्य की सभी विधाओं- कविता, कहानी, उपन्यास आदि में उल्लेखनीय है| मैंने पहले भी उनकी कुछ रचनाएं शेयर की हैं, आज एक और रचना शेयर कर रहा हूँ|

पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान के अलावा भारती जी को अनेक साहित्यिक पुरस्कार भी प्राप्त हुए थे| लीजिए आज धर्मवीर भारती जी की यह प्रसिद्ध रचना प्रस्तुत है-


आज-कल तमाम रात
चांदनी जगाती है|

मुँह पर दे-दे छींटे
अधखुले झरोखे से
अन्दर आ जाती है
दबे पाँव धोखे से

माथा छू
निंदिया उचटाती है
बाहर ले जाती है
घंटो बतियाती है|


ठंडी-ठंडी छत पर
लिपट-लिपट जाती है
विह्वल मदमाती है
बावरिया बिना बात?

आजकल तमाम रात
चाँदनी जगाती है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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