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अगर रिश्ते नहीं ढोते !

आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में रंजक जी ने इस स्थिति पर प्रहार किया है कि लोग ज़िंदगी भर औपचारिकताओं को ढोते हैं| क्या ही अच्छा हो कि हम प्रेम के संबंध जिए और मात्र औपचारिकता वाले रिश्तों को यथासंभव छोड़ दें|

लीजिए प्रस्तुत है रंजक जी का यह गीत-

बन्धु रे!
हम-तुम
घने जंगल की तरह होते
नम भर वाले अगर
रिश्ते नहीं ढोते
बन्धु रे, हम-तुम!


फिर न रेगिस्तान होते
देह में ऐसे
फिर न आते घर कि हम
मेहमान हों जैसे
हड्डियों को काटती क्यों
औपचारिकता
खोखली मुस्कान की
तह में नहीं रोते
बन्धु रे, हम-तुम!


चेहरों से उड़ गई
पहचान बचपन की
अजनबी से कौन फिर
बातें करे मन की
बात करने के लिए
अख़बार की कतरन

फेंक देते हैं हवा में
जागते-सोते
बन्धु रे, हम-तुम!


दृष्टि स्नेहिल
दूसरों के वास्ते रख कर
ख़ून हो कर
हो गये नाख़ून से बदतर
कनखियों के दंश
दरके हुए आँगन की
आड़ में काँटे नहीं बोते
बन्धु रे, हम-तुम!

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| ******

2 replies on “अगर रिश्ते नहीं ढोते !”

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