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हाट-बाज़ारों बिक न सका मैं!

आज मैं कुशल गीतकार नईम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नईम जी ने इस नवगीत में कवि की निष्ठा और प्रतिबद्धता को रेखांकित किया है| बाकी कविता अपनी बात स्वयं कहती है| लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-

लिखने जैसा लिख न सका मैं
सिकता रहा भाड़ में लेकिन,
ठीक तरह से सिक न सका मैं ।

गत दुर्गत जो भी होना थी, ख़ुद होकर मैं रहा झेलता,
अपने हाथों बना खिलौना, अपने से ही रहा खेलता.
परम्परित विश्वास भरोसों पर
यक़ीन से टिक न सका मैं ।


अपने बदरंग आईनों में, यदा-कदा ही रहा झांकता,
थी औक़ात, हैसियत, लेकिन अपने को कम रहा आंकता,
ऊँची लगी बोलियाँ लेकिन,
हाट-बाज़ारों बिक न सका मैं ।

अपने करे-धरे का अब तक, लगा न पाया लेखा-जोखा,
चढ़ न सकेगा अपने पर अब भले रंग हो बिलकुल चोखा,
चढ़ा हुआ पीठों मंचों पर
कभी आपको दिख न सका मैं ।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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3 replies on “हाट-बाज़ारों बिक न सका मैं!”

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