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बेरोज़गार हम!

डॉक्टर शांति सुमन जी हिन्दी की वरिष्ठ नवागीतकार हैं, बहुत वर्ष पहले शायद 1985 के आसपास झारखंड स्थित हिंदुस्तान कॉपर की परियोजना में आयोजित एक कवि सम्मेलन में गांव की स्थिति पर आधारित उनका नवगीत सुना था, जिसकी पंक्तियां थीं-

थाली उतनी की उतनी ही, छोटी हो गई रोटी,
कहती बड़की भौजी मेरे गांव की|


आज फिर से गांव में गरीब परिवार की स्थितियों को ही दर्शाने वाला गीत शेयर कर रहा हूँ, लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर शांति सुमन जी का यह गीत –


पिता किसान अनपढ़ मां, बेरोज़गार हैं हम
जाने राम कहां से होगी
घर की चिन्ता कम|

आंगन की तुलसी-सी बढ़ती
घर में बहन कुमारी
आसमान में चिड़िया-सी
उड़ती इच्छा सुकुमारी

छोटा भाई दिल्ली जाने का भरता है दम ।


पटवन के पैसे होते
तो बिकती नहीं ज़मीन
और तकाजे मुखिया के
ले जाते सुख को छीन

पतले होते मेड़ों पर आंखें जाती हैं थम ।

जहां-तहां फटने को है
साड़ी पिछली होली की
झुकी हुई आंखें लगती हैं
अब करुणा की बोली सी
समय-साल ख़राब टंगे रहते बनकर परचम ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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