ऐ शरीफ़ इंसानों!

हिंदुस्तान के एक नामवर शायर, जिनका भारतीय फिल्मों के गीत-ग़ज़ल लेखन में भी बहुत बड़ा योगदान है और जो कवि-लेखकों के स्वाभिमान की रक्षा के लिए सदा संघर्ष करते रहे, ऐसे महान शायर और गीतकार स्वर्गीय साहिर लुधियानवी जी की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ|

इस रचना में साहिर साहब ने युद्ध की विभीषिका से परिचित कराया है और बताया है कि अगर दुनिया में जंग न हो और पूरी मानव-जाति शांति से रहे तो उससे बेहतर कुछ नहीं है क्योंकि युद्ध से किसी का भला नहीं होता| लीजिए प्रस्तुत है साहिर जी की यह नज़्म-


खून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ऐ-आदम का खून है आख़िर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,
अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर !

बम घरों पर गिरे कि सरहद पर ,
रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !
खेत अपने जले कि औरों के ,
जीस्त फ़ाकों से तिलमिलाती है !

टैंक आगे बढे कि पीछे हटें,
कोख धरती की बांझ होती है !
फतह का जश्न हो कि हार का सोग,
जिंदगी मय्यतों पे रोती है !


जंग तो खुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी ?
आग और खून आज बख्शेगी
भूख और एहतयाज कल देगी !

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,
जंग टलती है तो बेहतर है !
आप और हम सभी के आंगन में ,
शमा जलती रहे तो बेहतर है !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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