मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़ुबां!

आज हसरत जयपुरी साहब का लिखा एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| यह गीत 1955 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘आब ए हयात’ के लिए सरदार मलिक जी के संगीत निर्देशन में हेमंत कुमार जी ने अपने सुरीले अंदाज़ में गाया था| और हां इस फिल्म के नायक थे प्रेम नाथ जी| यह फिल्म तो नहीं लगता कि ज्यादा चली होगी लेकिन यह गीत बहुत प्यारा था|

मैंने यह फिल्म नहीं देखी, लेकिन यह 70 के दशक की बात है जब मैं शाहदरा में रहता था और वहाँ पास ही विश्वास नगर में ‘स्वर्ण’ नाम से एक अस्थाई सिनेमा हॉल टिन से बनाया गया था, जहां यह फिल्म लगी थी| ऐसा कई बार हुआ कि मैं इस हॉल के पास किसी काम से गया और मैंने बाहर से ही यह गीत पूरा सुना, जहां कम से कम गानों की आवाज़ तो जोरदार आती थी|

आज अचानक इस गीत की याद आई तो लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-


मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़ुबां
बेकसों के लिए प्यार का आसमां|

मैं जो गाता चलूं साथ महफ़िल चले,
मैं जो बढ़ता चलूं साथ मंज़िल चले,
साथ मंज़िल चले,
मुझे राहें दिखाती चलें बिजालियां|
मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़ुबां|


हुस्न भी देखकर मुझको हैरान है,
इश्क़ को मुझसे मिलने का अरमान है,
देखो अरमान है
अपनी दुनिया का हूं मैं हसीं नौजवां|

कारवां ज़िंदगानी का रुकता नहीं,
बादशाहों के आगे मैं झुकता नहीं,
हां जी झुकता नहीं
चाँद तारों से आगे मेरा आशियां|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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