सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूं !

आज एक बार फिर से मैं स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| राहत जी अपने सबसे अलग अंदाज़ ए बयां के लिए प्रसिद्ध थे| जो एक अलग प्रकार का ‘पंच’ उनकी रचनाओं में आता था वो पाठकों और श्रोताओं का मन मोह लेता था|

लीजिए प्रस्तुत है राहत इन्दौरी साहब की यह ग़ज़ल

मोम के पास कभी आग को लाकर देखूं
सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूं |

कभी चुपके से चला आऊँ तेरी खिलवत में
और तुझे तेरी निगाहों से बचा कर देखूं |

मैने देखा है ज़माने को शराबें पी कर
दम निकल जाये अगर होश में आकर देखूं |

दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूं |

तेरे बारे में सुना ये है के तू सूरज है
मैं ज़रा देर तेरे साये में आ कर देखूं |

याद आता है के पहले भी कई बार यूं ही
मैने सोचा था के मैं तुझको भुला कर देखूं |

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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