मैंने उनके भी गिरेबान फटे देखे हैं!

स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी काव्य मंच पर अपनी उपस्थिति से अलग प्रकार का वातावरण सृजित करते थे| वे सामान्यतः खुद्दारी से भरी अभिव्यक्ति करते थे, वैसे प्रेम गीत भी उन्होंने बहुत सुंदर लिखे हैं|


उनकी कुछ पंक्तियाँ जो अक्सर याद आती हैं, वे हैं ‘एक भी आँसू न कर बेकार, जाने कब समंदर मांगने आ जाए’, ‘हमें हस्ताक्षर करना न आया चेक पर माना, मगर दिल पर बड़ी कारीगरी से नाम लिखते हैं’ आदि|


लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का यह गीत –


तुमने हाँ जिस्म तो आपस में बंटे देखे हैं
क्या दरख्तों के कहीं हाथ कटे देखे हैं|

वो जो आए थे मुहब्बत के पयम्बर बनकर
मैंने उनके भी गिरेबान फटे देखे हैं|

वो जो दुनिया को बदलने की कसम खाते थे
मैंने दीवार से वो लोग सटे देखे हैं|

तन पे कपड़ा भी नहीं पेट में रोटी भी नहीं
फ़िर भी मैदान में कुछ लोग डटे देखे हैं|

जिनको लुटने के सिवा और कोई शौक़ नहीं
ऐसे इंसान भी कुछ हमने लुटे देखे हैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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