चारों ओर मचान है!

स्वर्गीय रमेश रंजक जी देश के अत्यंत सृजनधर्मी जनवादी नवागीतकार थे| अनेक बार उनको कवि गोष्ठियों में सुनने का अवसर मिला और मेरे लिए गर्व की बात है कि उन्होंने मेरा एक नवगीत अंतराल 4 में छपने के लिए भेजा था|

रंजक जी के अनेक गीत किसी समय मुझे कंठस्थ थे, जैसे ‘बंधु रे हम तुम, गहने जंगल की तरह होते’, ‘एक थैला, दो शिकन, हम तीन’, ‘व्यक्त तलाशी लेगा वो भी चढ़े बुढ़ापे में, संभाल कर चल’ आदि|

लीजिए आज प्रस्तुत है, व्यवस्था के हिंसक स्वरूप को दर्शाने वाला, स्वर्गीय रंजक जी का यह गीत –


बचकर कहाँ चलेगा पगले, चारों ओर मचान है
हर मचान पर एक शिकारी, आँखों में शैतान है !

हवा धूल में बटमारीपन, छाया की तासीर गरम
सरमायेदारों के कपड़े, पहने घूम रहा मौसम
नद्दी-नालों की ज़ंजीरें हरियल टहनीदार नियम
न्यायाधीश पहाड़ मौन हैं, खा-पीकर रिश्वती रकम
सत्ता के जंगल की पत्ती-पत्ती बेईमान है !

चारों ओर अंधेरा गहरा, पहरा है संगीन का
महंगाई ने हाँका मारा, बजा कनस्तर टीन का
जिनको पाँव मिले वे भागे, पंजा पड़ा मशीन का
जहाँ बचाएँ प्राण, नहीं रे ! टुकड़ा मिला ज़मीन का
कहाँ छुपाएँ अंडे-बच्चे हर प्राणी हैरान है !


पहले पूरब फिर पच्छिम में, गोली चली मचान से
दक्खिन थर-थर काँपा, उत्तर चीख़ पड़ा जी-जान से
सिसकी लेकर मध्यम धरती, बोली दबी ज़ुबान से
राम बचाए, राम बचाए, ऐसे हिन्दुस्तान से
लाठी, गोली, अश्रु-गैस, जीना क्या आसान है ?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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