कोई शहर से आया होगा!

आज विख्यात अभिनेत्री शबाना आज़मी के पिता और हमारे देश के जाने माने शायर ज़नाब कैफ़ी आज़मी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूं| कैफ़ी आज़मी साहब को एक विद्रोही शायर के रूप में भी जाना जाता है| एक अनोखा ही अंदाज़ था उनका बात कहने का, जैसे ‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो‘|

लीजिए आज प्रस्तुत है कैफ़ी आज़मी साहब की यह ग़ज़ल :



शोर यूँ ही न परिंदों ने मचाया होगा
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा|

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा|

बानी-ए-जश्न-ए-बहाराँ ने ये सोचा भी नहीं
किस ने काँटों को लहू अपना पिलाया होगा|

बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा|

अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे
हर सराब उन को समुंदर नज़र आया होगा|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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