सारा जग मधुवन लगता है!

हिन्दी काव्य मंचों पर गीतों के राजकुमार के नाम से विख्यात हुए स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी ने भारतीय फिल्मों को भी अपने साहित्यिक और रोमांटिक गीतों के माध्यम से समृद्ध किया था| विशेष बात यह थी कि नीरज जी को स्वर्गीय मीना कुमारी जी फिल्मों में ले गई थीं जो स्वयं एक बेहतरीन अभिनेत्री होने के अलावा एक श्रेष्ठ शायरा भी थी|

मुझे भी अपने कुछ आयोजनों में नीरज जी को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित करने का सौभाग्य मिला था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का यह गीत –



दो गुलाब के फूल छू गए, जब से होंठ अपावन मेरे,
ऐसी गंध बसी है मन में, सारा जग मधुवन लगता है|

रोम-रोम में खिले चमेली,
सांस-सांस में महके बेला,
पोर-पोर से झरे मालती,
अंग-अंग जूही का मेला|

पग-पग लहरे मानसरोवर, डगर-डगर छाया कदंब की,
तुम जब से मिल गए उम्र का खंडहर राजभवन लगता है|

छिन-छिन ऐसा लगे कि कोई
बिना रंग के खेले होली,
यूं मदमाते प्राण कि जैसे
नई बहू की चंदन डोली|


जेठ लगे सावन मनभावन, और दुपहरी सांझ बसंती,
ऐसा मौसम फिरा धूल का ढेला एक रतन लगता है|

जाने क्या हो गया कि हरदम
बिना दिये के रहे उजाला,
चमके लाल बिछावन जैसे
तारों वाला नील दुशाला|

हस्तामलक हुए सुख सारे, दुख के ऐसे ढहे कगारे,
विघ्न–वचन लगता था जो कल, वह अब अभिनंदन लगता है|

तुम्हें चूमने का गुनाह कर
ऐसा पुण्य कर गई माटी,
जन्म जन्म के लिए हरी
हो गई प्राण की बंजर घाटी|

पाप-पुण्य की बात न छेड़ो, स्वर्ग-नर्क की करो न चर्चा,
याद किसी की मन में हो तो, मगहर वृंदावन लगता है|


तुम्हें देख क्या लिया कि कोई
सूरत दिखती नहीं पराई,
तुमने क्या छू दिया, बन गई
महाकाव्य कोई चौपाई|

कौन करे अब मठ में पूजा, कौन फिराए हाथ सुमिरिनी,
जीना हमें भजन लगता है, मरना हमें हवन लगता है|

दो गुलाब के फूल छू गए, जब से होंठ अपावन मेरे,
ऐसी गंध बसई है मन में, सारा जग मधुवन लगता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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