अंग-अंग डोल गई रंग भरी बातें!

आज एक बार फिर से मधुर और सृजनशील गीतकार सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने जहां राष्ट्र और राष्ट्रभाषा को लेकर बहुत प्रेरक गीत लिखे हैं, वहीं उन्होंने बहुत नाजुक मनोभावों और मनः स्थितियों का चित्रण भी अपने गीतों में बड़ी कुशलता से किया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, माननीय सोम ठाकुर जी का यह गीत-



महुए – से महके दिन
मेंहदी – सी रातें
केसर – सी घोल गई
रंग भरी बातें

सुनी जो मिली कहीं खेतों की राहें
सरसों की पगडंडी , आमों कि छाहें
सुने जो मिले कहीं मुड़ते गलियारे
लहरों के चित्र -लिखे रेतिया किनारे
ठहर गया मन , ठहरे पाँव भी अजाने
अंग-अंग डोल गई रंग भरी बातें|

गीत रचे धरती, आकाश गुनगुनाए
पूरब ने गाए, पश्चिम ने दुहराए
शाकुन्तल स्वप्न बहे गीत के बहाने
कानों ने जाने, प्राणों ने पहचाने
वंशी के संग -संग जाने कब -कैसे
कंगन को तोल गई रंग भरी बातें|

उड़ती हैं चाहों की अनगिन कंदीलें

नैनों के हंस, रूप – रंगों की झीलें
हार गये बंद द्वार, गंध पवन जीती
हो गई ये बीती घड़ियाँ अनबीती
मन -मन को बाँध गई लौटती विदायें
गाँठ -गाँठ खोल गई रंग भरी बातें
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आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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