चंदन वन डूब गया 2

माना सहमी गलियों में न रहा जाएगा,
सांसों का भारीपन भी न सहा जाएगा,
किंतु विवशता है जब अपनों की बात चली,
कांपेंगे अधर और कुछ न कहा जाएगा।

किशन सरोज

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