देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन!

बांचते हम रह गए अंतर्कथा,
स्वर्णकेशा गीत वधुओं की व्यथा,
ले गया चुनकर कंवल, कोई हठी युवराज,
देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन।

किशन सरोज

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