हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन!

तुम गए क्या जग हुआ अंधा कुआं
रेल छूटी रह गया केवल धुआं,
हम भटकते ही फिरे बेहाल,
हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन।

किशन सरोज

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