रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला!

एक जमाने में कवि सम्मेलनों में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाले स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी को आज याद करते हैं उनकी सबसे अधिक प्रसिद्ध कृति ‘मधुशाला’ के कुछ छंदों के माध्यम से, यह रचना उन्होंने उम्र खैयाम की रूबाइयों के आधार पर लिखी थी| यह रचना अपने आप में ही इतनी मोहक है और एक प्रकार का दर्शन भी प्रस्तुत करती है| एक ऐसे कवि द्वारा शराब पर लिखी गई रचना जो स्वयं कभी शराब नहीं पीता था|

इस काव्य का कुछ प्रारंभिक अंश मैं पहले शेयर कर चुका हूँ, आज उसके कुछ बाद का अंश|

लीजिए प्रस्तुत हैं इस प्रसिद्ध रचना का कुछ अंश-


बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
‘होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले’
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।16।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।17।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।18।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला’
‘और लिये जा, और पिये जा’, इसी मंत्र का जाप करे’
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।19।


बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।20।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

Leave a Reply