हैं बहुत छोटे!

मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी के बहुत से गीत मैंने पहले शेयर किए हैं| बहुत ही सरल स्वभाव वाले और अत्यंत सृजनशील रचनाकार थे डॉक्टर बेचैन जी, मुझे भी उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत-


जिंदगी की लाश
ढकने के लिए
गीत के जितने कफ़न हैं
हैं बहुत छोटे ।

रात की
प्रतिमा
सुधाकर ने छुई,
पीर यह
फिर से
सितारों सी हुई,
आँख का आकाश
ढकने के लिए
प्रीत के जितने सपन हैं
हैं बहुत छोटे।


खोज में हो
जो
लरजती छाँव की,
दर्द
पगडंडी नहीं
उस गाँव की,
पीर का उपहास
ढकने के लिए
अश्रु के जितने रतन हैं
हैं बहुत छोटे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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