वह मातृभूमि मेरी

आज फिर से मैं भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अभियान को अपने स्वर प्रदान करने वाले महान कवि , गांधी जी के लिए ‘चल पड़े जिधर दो डग मग में’, ‘वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो आदि अनेक प्रेरक रचना करने वाले स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की एक और, भारतवर्ष का गौरव गान करने वाली कविता शेयर कर रहा हूँ| |

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की यह कविता-


ऊँचा खड़ा हिमालय
आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले झुक,
नित सिंधु झूमता है।

गंगा यमुन त्रिवेणी
नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली
पग पग छहर रही है।

वह पुण्य भूमि मेरी,
वह स्वर्ण भूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

झरने अनेक झरते
जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियाँ चहक रही हैं,
हो मस्त झाड़ियों में।

अमराइयाँ घनी हैं
कोयल पुकारती है,
बहती मलय पवन है,
तन मन सँवारती है।

वह धर्मभूमि मेरी,
वह कर्मभूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

जन्मे जहाँ थे रघुपति,
जन्मी जहाँ थी सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई,
वंशी पुनीत गीता।

गौतम ने जन्म लेकर,
जिसका सुयश बढ़ाया,
जग को दया सिखाई,
जग को दिया दिखाया।


वह युद्ध–भूमि मेरी,
वह बुद्ध–भूमि मेरी।
वह मातृभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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