संध्या सिंदूर लुटाती है!

एक बार फिर से मैं आज हिन्दी काव्य मंचों पर अपने गीतों के माध्यम से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर देने वाले स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में बच्चन जी ने शाम के कुछ बहुत सुंदर चित्र प्रस्तुत किए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का यह गीत –



संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

रंगती स्‍वर्णिम रज से सुदंर
निज नीड़-अधीर खगों के पर,
तरुओं की डाली-डाली में कंचन के पात लगाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

करती सरि‍ता का जल पीला,
जो था पल भर पहले नीला,
नावों के पालों को सोने की चादर-सा चमकाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

उपहार हमें भी मिलता है,
श्रृंगार हमें भी मिलता है,
आँसू की बूंद कपोलों पर शोणित की-सी बन जाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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