कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है!


आज मैं सुदर्शन फाक़िर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| फाक़िर साहब ने बहुत अच्छी शायरी की है, उनकी बहुत सी ग़ज़लें प्रसिद्ध गायकों ने गयी हैं, जैसे कुछ शेर मुझे याद या रहे हैं-


अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें,
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें|
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ग़म बढे़ आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह,
तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह|

और

ज़हर पीने की तो आदत थी ज़माने वालों
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी|


लीजिए आज प्रस्तुत है, सुदर्शन फाक़िर जी की यह ग़ज़ल –


आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है,
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है|

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है|

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी,
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है|

ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब “फ़ाकिर”
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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