कहीं जाँ से भी न जाओ!

इन्हीं ख़ुशगुमानियों में कहीं जां से भी न जाओ,
वो जो चारागर नहीं है उसे ज़ख़्म क्यूं दिखाओ|

अहमद फ़राज़

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