आज पहली बार!

स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी अपने समय में हिन्दी के प्रमुख कवियों में से एक थे, वे प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में भी शामिल थे| सर्वेश्वर जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अन्य अनेक पुरस्कारों से अलंकृत किया गया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है सर्वेश्वर जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने हवा के बहाने से एक अच्छा संदेश दिया है –


आज पहली बार
थकी शीतल हवा ने
शीश मेरा उठाकर
चुपचाप अपनी गोद में रक्खा,
और जलते हुए मस्तक पर
काँपता सा हाथ रख कर कहा-

“सुनो, मैं भी पराजित हूँ
सुनो, मैं भी बहुत भटकी हूँ
सुनो, मेरा भी नहीं कोई
सुनो, मैं भी कहीं अटकी हूँ
पर न जाने क्यों
पराजय नें मुझे शीतल किया
और हर भटकाव ने गति दी;
नहीं कोई था
इसी से सब हो गए मेरे
मैं स्वयं को बाँटती ही फिरी
किसी ने मुझको नहीं यति दी”

लगा मुझको उठा कर कोई खडा कर गया
और मेरे दर्द को मुझसे बड़ा कर गया।
आज पहली बार।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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