उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से!

हर पुरवा का झोंका तेरा घुँघरू,
हर बादल की रिमझिम तेरी भावना,,
हर सावन की बूंद तुम्हारी ही व्यथा
हर कोयल की कूक तुम्हारी कल्पना|

जितनी दूर ख़ुशी हर ग़म से,
जितनी दूर साज सरगम से,
जितनी दूर पात पतझर का छाँव से,
उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से|

कुंवर बेचैन

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