सूरज डूब गया बल्ली भर!

स्वर्गीय नरेंद्र शर्मा जी जाने माने साहित्यिक गीतकार थे, उन्होंने जहां अनेक साहित्यिक रचनाएं हमें दी हैं, वहीं फिल्मों के लिए भी उन्होंने अनेक मधुर गीत लिखे हैं| जहां तक मुझे याद है रामायण जैसे सीरियलों की तैयारी में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान था| जैसे उनका एक गीत था – ‘ज्योति कलश छलके’, उन्होंने ‘द्रौपदी’,’सुवर्णा’ आदि प्रबंध काव्य भी लिखे थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेंद्र शर्मा जी’ का यह नवगीत-


सूरज डूब गया बल्ली भर-
सागर के अथाह जल में।
एक बाँस भर उठ आया है-
चांद, ताड के जंगल में।

अगणित उंगली खोल, ताड के पत्र, चांदनी में डोले,
ऐसा लगा, ताड का जंगल सोया रजत-छत्र खोले
कौन कहे, मन कहाँ-कहाँ
हो आया, आज एक पल में।

बनता मन का मुकुर इंदु, जो मौन गगन में ही रहता,
बनता मन का मुकुर सिंधु, जो गरज-गरज कर कुछ कहता,
शशि बनकर मन चढा गगन पर,
रवि बन छिपा सिंधु तल में।


परिक्रमा कर रहा किसी की, मन बन चांद और सूरज,
सिंधु किसी का हृदय-दोल है, देह किसी की है भू-रज
मन को खेल खिलाता कोई,
निशि दिन के छाया-छल में।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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