आखिर यही होता क्यों है!



भारतीय शायरों में अपनी एक खास पहचान रखने वाले ज़नाब कैफ़ी आज़मी साहब की लिखी एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने कुलदीप सिंह जी के संगीत निर्देशन में गाया है और फिल्म ‘अर्थ’ में इसे बड़ी खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है|

ज़िंदगी में कब कौन और कैसे अकेलापन महसूस करता है, इसका अनुभव दूसरों को होना मुश्किल होता है और इसको बयान भी आसानी से नहीं किया जा सकता|

लीजिए प्रस्तुत है कैफ़ी आज़मी साहब की यह ग़ज़ल –


कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों है ?
वो जो अपना था वोही और किसी का क्यों है ?
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है ?
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों है ?

एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ले दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों है ?

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों है ?

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है ?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
******

Leave a Reply